परिचय: अच्छी कक्षा का अर्थ केवल यह नहीं है कि शिक्षक ने पाठ पूरा कर दिया और बच्चों ने प्रश्नों के उत्तर दे दिए। Classroom Teaching की वास्तविक गुणवत्ता इस बात से तय होती है कि बच्चों ने क्या सीखा, कैसे सीखा और उस सीखने ने उनके सोचने तथा व्यवहार को किस तरह प्रभावित किया। इसके लिए शिक्षक को कक्षा में प्रवेश करने से पहले केवल पाठ पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। उसे यह भी सोचना होता है कि शिक्षा के व्यापक उद्देश्य क्या हैं, विषय पढ़ाने का उद्देश्य क्या है और चुनी गई विषयवस्तु बच्चों में किस प्रकार की समझ विकसित करेगी। इस लेख में हम इसी पूरी प्रक्रिया को उद्देश्य, तैयारी, शिक्षण प्रक्रिया, आकलन और चिंतनशील सोच के संदर्भ में समझेंगे।
Classroom Teaching को एक शिक्षण चक्र के रूप में समझना
कक्षा शिक्षण को एक चक्र के रूप में देखना होगा। इस चक्र के तीन प्रमुख हिस्से हैं—
- शिक्षण कार्य से पूर्व की तैयारी
- शिक्षण कार्य या शिक्षण प्रक्रिया
- चिंतनशील सोच (Reflective Thinking)
इस दृष्टिकोण में आकलन को अलग चरण न मानकर शिक्षण प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है।
शिक्षक की तैयारी केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे यह समझना आवश्यक है कि वह बच्चों को किस दिशा में ले जाना चाहता है।
तैयारी के तीन मूल प्रश्न

उदाहरण: यदि शिक्षक भूगोल में नक्शा पढ़ाना चाहता है, तो केवल नक्शे के संकेतों की जानकारी देना पर्याप्त नहीं होगा। उसे यह भी सोचना होगा कि बच्चे इस कौशल का उपयोग किस प्रकार करेंगे।
1. शिक्षा के सामान्य उद्देश्यों से शुरुआत
शिक्षण की तैयारी का पहला स्तर शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों से जुड़ा है।
शिक्षक को यह विचार करना चाहिए कि शिक्षा के माध्यम से हम किस प्रकार का समाज बनाना चाहते हैं। यदि हमारा लक्ष्य न्याय, समानता, सहयोग और सम्मान पर आधारित समाज है, तो इन मूल्यों की झलक कक्षा के व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।
मान लीजिए हम न्याय आधारित समाज की कल्पना करते हैं। तब केवल पाठ्यपुस्तक में न्याय की परिभाषा पढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा।
शिक्षक को यह देखना होगा—
- क्या सभी बच्चों को बोलने का अवसर मिल रहा है?
- क्या जाति, धर्म या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव तो नहीं हो रहा है?
- क्या कमजोर समझे जाने वाले बच्चों को भी समान अवसर मिल रहे हैं?
- क्या बच्चे एक-दूसरे के विचारों का सम्मान कर रहे हैं?
इसलिए शिक्षा के सामान्य उद्देश्य कक्षा के बाहर की कोई अमूर्त अवधारणा नहीं हैं। वे शिक्षक के दैनिक व्यवहार में/शिक्षण में दिखाई देने चाहिए।
उदाहरण: नक्शा पढ़ना
यदि बच्चे नक्शा पढ़ रहे हैं, तो शिक्षक केवल उनका कौशल नहीं देखेगा। वह यह भी देख सकता है कि बच्चे एक-दूसरे की सहायता कर रहे हैं या नहीं।
इस तरह नक्शा पठन विषयगत सीखने के साथ-साथ सहयोग की भावना को भी विकसित कर सकता है।
2. विषयगत उद्देश्य क्या हैं?
दूसरा प्रश्न है—जिस विषय को पढ़ाया जाना है, उस विषय का उद्देश्य क्या है?
हर विषय बच्चों में अलग-अलग प्रकार की समझ, कौशल और क्षमताओं को विकसित करने का अवसर देता है।
कुछ उदाहरण
| विषय | संभावित विषयगत उद्देश्य |
|---|---|
| गणित | तार्किक सोच और दैनिक समस्याओं को गणितीय ढंग से हल करना |
| भाषा | स्वतंत्र रूप से विचार करना और अपनी बात स्पष्ट रूप से रखना |
| सामाजिक विज्ञान | सामाजिक घटनाओं के बीच संबंधों को समझना |
| विज्ञान | वैज्ञानिक सोच और तार्किक दृष्टि विकसित करना |
इसलिए शिक्षक को गतिविधि चुनने से पहले विषय के उद्देश्य पर विचार करना चाहिए।
महत्वपूर्ण प्रश्न: क्या हमारी गतिविधि वास्तव में उस कौशल को विकसित कर रही है जिसे हम विकसित करना चाहते हैं?
3. पाठगत उद्देश्य और विषयवस्तु
अब तीसरा स्तर आता है—पाठगत उद्देश्य।
यहाँ शिक्षक यह देखता है कि विषयगत उद्देश्य प्राप्त करने के लिए कौन-सी विषयवस्तु माध्यम बनेगी।
उदाहरण के लिए भूगोल में अफ्रीका महाद्वीप को विषयवस्तु के रूप में लिया जा सकता है।
यहाँ बच्चे केवल अफ्रीका का नक्शा नहीं पढ़ेंगे। वे यह भी समझ सकते हैं कि—
- उसकी भौतिक संरचना कैसी है?
- उसका जलवायु से क्या संबंध है?
- वर्षा पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है?
- वहाँ के जनजीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
इस प्रकार विषयवस्तु केवल जानकारी देने का माध्यम नहीं रहती। वह बच्चों को भूगोल में विभिन्न घटनाओं के मध्य संबंधों को समझने का अवसर देती है।
उदाहरण: नक्शा पठन कौशल
यदि उद्देश्य नक्शा पढ़ने का कौशल विकसित करना है, तो शिक्षक को पहले से योजना बनानी होगी कि बच्चे—
- दिशा पहचानें।
- पैमाने को समझें।
- संकेत-चिह्नों को पढ़ें।
- रंगों का अर्थ समझें।
- नक्शे से आवश्यक जानकारी प्राप्त करें।
- प्राप्त जानकारी को अपने शब्दों में व्यक्त करें।
यहाँ व्यक्तिगत, जोड़ी और समूह कार्य तीनों उपयोगी हो सकते हैं।
शिक्षण प्रक्रिया: तैयारी से कक्षा तक
तैयारी के बाद शिक्षक कक्षा में प्रवेश करता है। अब उसकी योजना वास्तविक शिक्षण प्रक्रिया में बदलती है।
इस चरण में सबसे पहले सीखने के वातावरण पर ध्यान देना आवश्यक है।
सीखने का अच्छा वातावरण कैसा हो?
अच्छा सीखने का वातावरण वह है जहाँ बच्चे स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें।
ऐसी कक्षा में—
- बच्चों के अनुभवों का सम्मान होता है।
- उन्हें अपनी बात कहने का अवसर मिलता है।
- गलतियों को सीखने का अवसर माना जाता है।
- शिक्षक और बच्चों के बीच संवाद होता है।
- बच्चे एक-दूसरे से सीखते हैं।
- सभी बच्चों को भागीदारी का अवसर मिलता है।
उदाहरण: यदि कोई बच्चा प्रश्न का गलत उत्तर देता है, तो शिक्षक तुरंत उसे गलत घोषित करने के बजाय पूछ सकता है—“तुमने ऐसा क्यों सोचा?”
इस छोटे से बदलाव से गलती सीखने का साधन बन सकता है।
कक्षा संचालन केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं है
कक्षा संचालन में कुछ गतिविधियाँ ऐसी होती हैं जो शिक्षण की परिस्थितियाँ तैयार करती हैं।
जैसे—
- बच्चों को गतिविधि के अनुसार बैठाना।
- पुस्तक खोलने के लिए कहना।
- आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना।
- समूह बनाना।
इसके विपरीत कुछ गतिविधियाँ सीधे सीखने से जुड़ी होती हैं।
जैसे—
- चर्चा करना।
- खोज करना।
- समस्या हल करना।
- किसी विषय पर तर्क प्रस्तुत करना।
- अपने अनुभव साझा करना।
इसलिए शिक्षक को दोनों प्रकार की गतिविधियों में अंतर समझना चाहिए।
पूर्व ज्ञान को समझना क्यों जरूरी है?
किसी भी नए ज्ञान को समझने में बच्चों का पूर्व ज्ञान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसलिए शिक्षक को यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि बच्चे पहले से क्या जानते हैं।
इसके लिए शिक्षक प्रश्न पूछ सकता है—
“तुमने इसके बारे में पहले क्या देखा या सुना है?”
या—
“तुम्हारे अनुभव में ऐसा कहाँ हुआ है?”
इस तरह बच्चों के अनुभव कक्षा के शिक्षण का आधार बन सकते हैं।
Cooperative Learning और कक्षा शिक्षण
Cooperative Learning में बच्चे केवल शिक्षक से नहीं सीखते। वे अपने साथियों के साथ संवाद और सहयोग करते हुए भी सीखते हैं।
इसमें—
- जोड़ी में काम,
- छोटे समूह में काम,
- चर्चा,
- विचार साझा करना,
- समस्या समाधान
जैसी प्रक्रियाएँ महत्वपूर्ण होती हैं।
परंपरागत कक्षा में सभी बच्चे एक ही कार्य व्यक्तिगत रूप से कर सकते हैं। Cooperative Learning में वही कार्य सहयोगात्मक रूप से किया जा सकता है।
उदाहरण
यदि बच्चों को अफ्रीका के भौतिक स्वरूप का अध्ययन करना है, तो प्रत्येक समूह को नक्शे का एक भाग दिया जा सकता है।
समूह चर्चा के बाद बच्चे अपने निष्कर्ष पूरी कक्षा के सामने रख सकते हैं।
इस प्रक्रिया में विषयगत समझ के साथ संवाद, सहयोग और तर्क जैसे कौशल भी विकसित होते हैं।
शिक्षण सहायक सामग्री का विवेकपूर्ण उपयोग
सहायक सामग्री तभी उपयोगी है जब वह बच्चों को सीखने का वास्तविक अवसर देती है।
उदाहरण के लिए यदि ग्लोब पर कार्य कराया जा रहा है और पूरी कक्षा में केवल एक ग्लोब है, तो सभी बच्चों को समान सीखने का अवसर नहीं मिलेगा।
कुछ बच्चे ग्लोब को पास से देखेंगे। कुछ केवल दूर से देखते रहेंगे।
इसलिए शिक्षक को सोचना चाहिए—
क्या उपलब्ध सामग्री सभी बच्चों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रही है?
यदि बच्चों को छोटे समूहों में काम करना है, तो एक से अधिक ग्लोब या वैकल्पिक सामग्री की आवश्यकता हो सकती है।
यहीं समानता (Equality) और समता (Equity) के अर्थ कक्षा की वास्तविक परिस्थितियों में सामने आते हैं।
आकलन: शिक्षण प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा
आकलन केवल परीक्षा या ग्रेड देने का माध्यम नहीं है।
अच्छा शिक्षक शिक्षण के दौरान लगातार यह देखता है कि बच्चे—
- क्या समझ रहे हैं?
- कहाँ कठिनाई महसूस कर रहे हैं?
- अपने ज्ञान का उपयोग कैसे कर रहे हैं?
- अपने उत्तर के पीछे तर्क दे पा रहे हैं या नहीं?
इसलिए औपचारिक और अनौपचारिक दोनों प्रकार के आकलन उपयोगी हैं।
उदाहरण
यदि बच्चे नक्शा पढ़ रहे हैं, तो शिक्षक केवल यह नहीं पूछे कि “उत्तर क्या है?”
वह पूछ सकता है—
“तुमने यह स्थान इस दिशा में क्यों बताया?”
इस प्रश्न से बच्चे के उत्तर के साथ उसके तर्क को भी समझा जा सकता है।
अभ्यास और अनुप्रयोग के अवसर
सीखने को मजबूत बनाने के लिए बच्चों को अभ्यास और अनुप्रयोग के अवसर चाहिए।
गृहकार्य भी इसका एक माध्यम हो सकता है। लेकिन गृहकार्य ऐसा होना चाहिए जिसे बच्चा अपनी क्षमता के अनुसार स्वतंत्र रूप से कर सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षक अगले दिन उस कार्य को देखें।
यदि बच्चे से गलती हुई है, तो उसे सुधारने का अवसर भी मिलना चाहिए।
Reflective Thinking: शिक्षण चक्र का अंतिम चरण
शिक्षण के बाद शिक्षक के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—
“मेरी योजना और वास्तविक शिक्षण के बीच क्या हुआ?”
यही चिंतनशील सोच (Reflective Thinking) का आधार है।
शिक्षक स्वयं से पूछ सकता है—
- क्या मेरा उद्देश्य स्पष्ट था?
- क्या सभी बच्चों ने भाग लिया?
- क्या गतिविधि उद्देश्य के अनुरूप थी?
- बच्चों को कहाँ कठिनाई हुई?
- क्या मेरी शिक्षण सामग्री पर्याप्त थी?
- अगली बार मुझे क्या बदलना चाहिए?
यह प्रक्रिया शिक्षक को अपने अभ्यास में लगातार सुधार करने में सहायता करती है।
Classroom Teaching के लिए एक सरल Framework
पूरी चर्चा को पाँच चरणों में समझा जा सकता है—
| चरण | मुख्य प्रश्न |
|---|---|
| उद्देश्य | हम बच्चों में क्या विकसित करना चाहते हैं? |
| तैयारी | इसे प्राप्त करने के लिए क्या योजना चाहिए? |
| शिक्षण | कक्षा में बच्चों को कैसे सक्रिय करेंगे? |
| आकलन | बच्चे कितना और कैसे सीख रहे हैं? |
| चिंतन | अगली बार क्या बेहतर किया जा सकता है? |
यही चक्र शिक्षण को केवल “पाठ पूरा करने” की प्रक्रिया से आगे ले जाता है।
व्यवहारिक उपयोग: शिक्षक आज से क्या कर सकते हैं?
हर पाठ से पहले शिक्षक पाँच मिनट देकर इन प्रश्नों पर विचार कर सकता है—
- आज का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- बच्चों के पास पहले से कौन-सा ज्ञान हो सकता है?
- कौन-सी गतिविधि सबसे उपयोगी होगी?
- सभी बच्चों को भागीदारी का अवसर कैसे मिलेगा?
- मैं सीखने को कैसे देखूँगा?
पाठ के बाद दो प्रश्न और जोड़ें—
- बच्चों ने क्या सीखा?
- मेरी अगली कक्षा में क्या सुधार होना चाहिए?
धीरे-धीरे यह प्रक्रिया शिक्षक के नियमित अभ्यास का हिस्सा बन सकती है।
विशेषज्ञ सुझाव
प्रभावी Classroom Teaching के लिए निम्न बातों को विशेष रूप से ध्यान में रखा जा सकता है—
- पहले उद्देश्य स्पष्ट करें, फिर गतिविधि चुनें।
- विषयवस्तु को विषयगत उद्देश्य से जोड़ें।
- बच्चों के पूर्व अनुभवों को महत्व दें।
- सभी बच्चों को सीखने का अवसर दें।
- समूह कार्य के लिए केवल बैठने की व्यवस्था न बनाएं।
- सहायक सामग्री का उपयोग उद्देश्य के अनुसार करें।
- आकलन को शिक्षण के साथ जोड़ें।
- बच्चों की गलतियों को सीखने का अवसर मानें।
- प्रत्येक कक्षा के बाद अपने शिक्षण पर विचार करें।
निष्कर्ष
Classroom Teaching को केवल विषयवस्तु पढ़ाने की प्रक्रिया मानना इसके व्यापक स्वरूप को सीमित कर देता है। प्रभावी शिक्षण की शुरुआत कक्षा में प्रवेश करने से पहले होती है। शिक्षक को शिक्षा के सामान्य उद्देश्य, विषयगत उद्देश्य और पाठगत उद्देश्य के बीच संबंध समझना होता है।
इसके बाद सीखने का सुरक्षित वातावरण, बच्चों की सक्रिय भागीदारी, Cooperative Learning, उपयुक्त शिक्षण सामग्री और सतत आकलन शिक्षण प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं।
अंततः Reflective Thinking शिक्षक को अपने अभ्यास की समीक्षा करने और उसमें लगातार सुधार करने का अवसर देती है।
इसलिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने रहता है—
क्या हम केवल पाठ पढ़ा रहे हैं, या ऐसी कक्षा बना रहे हैं जहाँ बच्चे सीखने, सोचने, प्रश्न करने और सहयोग करने के लिए स्वतंत्र हों?
यही प्रश्न Classroom Teaching की गुणवत्ता को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत हो सकता है।
FAQs
1. Classroom Teaching क्या है?
Classroom Teaching कक्षा में बच्चों के साथ सीखने-सिखाने की योजनाबद्ध और संवादात्मक प्रक्रिया है। इसमें केवल विषयवस्तु पढ़ाना शामिल नहीं है। उद्देश्य निर्धारण, तैयारी, कक्षा का वातावरण, बच्चों की भागीदारी, आकलन और शिक्षण के बाद चिंतन भी इसका हिस्सा हैं।
2. शिक्षण की तैयारी में कौन-से प्रश्न महत्वपूर्ण हैं?
मुख्यतः तीन प्रश्न महत्वपूर्ण हैं—शिक्षा के उद्देश्य क्या हैं, विषय पढ़ाने के उद्देश्य क्या हैं और उन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कौन-सी विषयवस्तु तथा गतिविधियाँ उपयोगी होंगी।
3. विषयगत उद्देश्य और पाठगत उद्देश्य में क्या अंतर है?
विषयगत उद्देश्य उस विषय के माध्यम से विकसित किए जाने वाले कौशल और क्षमताओं से जुड़ा होता है। पाठगत उद्देश्य किसी विशेष विषयवस्तु के माध्यम से विकसित की जाने वाली समझ से संबंधित होता है।
4. Cooperative Learning क्यों महत्वपूर्ण है?
Cooperative Learning बच्चों को जोड़ी और छोटे समूहों में सीखने का अवसर देता है। इससे विषयगत समझ के साथ संवाद, सहयोग, तर्क और सामाजिक सहभागिता जैसे कौशलों को भी विकसित करने का अवसर मिलता है।
5. आकलन को शिक्षण का हिस्सा क्यों माना जाना चाहिए?
आकलन से शिक्षक यह समझ सकता है कि बच्चे क्या सीख रहे हैं और कहाँ कठिनाई महसूस कर रहे हैं। इसलिए आकलन केवल ग्रेड देने के बजाय सीखने में सुधार का साधन बन सकता है।
6. Reflective Thinking क्या है?
Reflective Thinking शिक्षक द्वारा अपने शिक्षण अनुभव की समीक्षा करने की प्रक्रिया है। इसमें शिक्षक अपने उद्देश्य, गतिविधियों, बच्चों की भागीदारी और सीखने के परिणामों पर विचार करता है तथा भविष्य के शिक्षण में सुधार की योजना बनाता है।
Call to Action
यदि आप शिक्षक, शिक्षक-प्रशिक्षक या अकादमिक नेतृत्व की भूमिका में हैं, तो अगली कक्षा से पहले केवल पाठ की तैयारी न करें। इन पाँच प्रश्नों को लिखकर देखें—उद्देश्य क्या है? बच्चे पहले से क्या जानते हैं? वे क्या करेंगे? मैं सीखने को कैसे देखूँगा? और अगली बार क्या बेहतर करूँगा?
अपने अनुभव को साझा करें और बताएं कि आपकी कक्षा में इनमें से कौन-सा प्रश्न सबसे अधिक उपयोगी रहा।
Image SEO Suggestions
Image 1: Featured Image
Image Prompt:
भारतीय विद्यालय की कक्षा में शिक्षक बच्चों के साथ सीखने की गतिविधि की योजना बनाते हुए, सामने पाठ्यपुस्तक, नक्शा और शिक्षण सामग्री, बच्चे सक्रिय और संवादात्मक, realistic Indian education setting, documentary photography style.
Alt Text: Classroom Teaching में शिक्षक बच्चों के साथ सीखने की गतिविधि की तैयारी करते हुए
Caption: प्रभावी Classroom Teaching की शुरुआत उद्देश्य और तैयारी से होती है।
File Name: classroom-teaching-purpose-preparation.jpg
Image 2: Teaching Cycle
Image Prompt:
एक साफ और आधुनिक educational infographic showing three connected stages: Purpose & Preparation → Teaching Process → Reflective Thinking, Indian classroom context, minimal professional educational design.
Alt Text: Classroom Teaching का उद्देश्य, शिक्षण प्रक्रिया और Reflective Thinking चक्र
Caption: Classroom Teaching एक सतत चक्र है—तैयारी, शिक्षण और चिंतन।
File Name: classroom-teaching-cycle.jpg
Image 3: Cooperative Learning
Image Prompt:
Indian school children working collaboratively in small groups with maps and globes, teacher facilitating discussion, inclusive classroom, equal participation, realistic documentary educational photography.
Alt Text: बच्चों का Cooperative Learning में समूह के साथ कार्य करना
Caption: समूह में सीखना बच्चों को सहयोग, संवाद और तर्क का अवसर देता है।
File Name: cooperative-learning-classroom.jpg
Internal Linking Suggestions for RST EDU
इस लेख से आपकी वेबसाइट के निम्न विषयों पर आंतरिक लिंक बनाए जा सकते हैं—
- सीखने के वातावरण का निर्माण: प्रभावी कक्षा की पहचान
- सहयोगात्मक अधिगम (Cooperative Learning): अर्थ और कक्षा में उपयोग
- कक्षा में आकलन: सीखने को बेहतर बनाने का माध्यम
- Learning Outcomes को कक्षा शिक्षण से कैसे जोड़ें
- शिक्षक की Reflective Practice: निरंतर सुधार का आधार
External Linking Suggestions
विश्वसनीय संदर्भों के लिए निम्न आधिकारिक स्रोत उपयोग किए जा सकते हैं—
- National Education Policy (NEP) 2020 — Ministry of Education
- National Curriculum Framework for School Education (NCF-SE) 2023 — Ministry of Education
- NCERT — Curriculum, textbooks और शैक्षिक संसाधन
- DIKSHA — शिक्षक एवं विद्यार्थियों के लिए डिजिटल शैक्षिक संसाधन
इस लिंक को लेख में वहीं जोड़ना बेहतर होगा जहाँ संबंधित अवधारणा का उल्लेख किया गया है।
Social Media SEO
Facebook Caption
क्या अच्छी कक्षा केवल पाठ पूरा करने से बनती है?
असल Classroom Teaching उद्देश्य, तैयारी, बच्चों की सक्रिय भागीदारी, आकलन और Reflective Thinking का एक पूरा चक्र है।
इस लेख में जानिए कि शिक्षक कक्षा शिक्षण को अधिक उद्देश्यपूर्ण और प्रभावी कैसे बना सकता है।
LinkedIn Caption
Effective Classroom Teaching begins before the teacher enters the classroom.
शिक्षण की गुणवत्ता केवल विषयवस्तु के ज्ञान पर निर्भर नहीं करती। उद्देश्य की स्पष्टता, विषयगत तैयारी, सीखने का वातावरण, Cooperative Learning, आकलन और Reflective Thinking भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
इस लेख में Classroom Teaching को एक संपूर्ण शिक्षण चक्र के रूप में समझने का प्रयास किया गया है।
क्या हम केवल पाठ पढ़ा रहे हैं या बच्चों को वास्तव में सीखने का अवसर दे रहे हैं?
Classroom Teaching में उद्देश्य, तैयारी, सीखने का वातावरण, Cooperative Learning, आकलन और Reflective Thinking की भूमिका को सरल भाषा में समझें।
SEO Final Checklist
| SEO Element | स्थिति |
|---|---|
| Focus Keyphrase | ✅ Classroom Teaching |
| SEO Title | ✅ तैयार |
| Meta Description | ✅ तैयार |
| URL Slug | ✅ तैयार |
| Secondary Keywords | ✅ शामिल |
| Focus Keyphrase – Introduction | ✅ |
| Focus Keyphrase – Subheading | ✅ |
| Focus Keyphrase – Conclusion | ✅ |
| H2/H3 Subheadings | ✅ पर्याप्त |
| Short Paragraphs | ✅ |
| Transition-friendly Structure | ✅ |
| Active Voice | ✅ प्राथमिकता |
| FAQ | ✅ 6 प्रश्न |
| Internal Linking | ✅ 5 सुझाव |
| Image SEO | ✅ 3 चित्र |
| Featured Image | ✅ सुझाव सहित |
| Social Media SEO | ✅ 3 प्लेटफॉर्म |
| CTA | ✅ शामिल |
| Keyword Stuffing | ✅ नहीं किया गया |
| अनुमानित Keyword Density | लगभग 1% के आसपास रखने का प्रयास |
| Yoast Readability | 🟢 अच्छा आधार |
| संभावित सुधार | Publish से पहले Yoast में वास्तविक sentence length और keyphrase density जाँचें |
विशेष टिप्पणी: मूल लेख में मौजूद विचारों और उदाहरणों को प्राथमिकता दी गई है। जहाँ NEP 2020, NCF-SE 2023 आदि के संदर्भ उपयोगी हो सकते हैं, उन्हें इस ड्राफ्ट में विस्तार से जोड़ने के बजाय External Linking Suggestions में रखा गया है, ताकि मूल सामग्री की वैचारिक सीमा बिना प्रमाण के न बदले।
एक सम्पूर्ण शिक्षण चक्र (कक्षा शिक्षण: उद्देश्य-तैयारी) को ध्यान से देखा जाए तो इसके तीन हिस्से नज़र आते हैं. पहले हिस्से को शिक्षण कार्य से पूर्व की तैयारी, दूसरे हिस्से को शिक्षण कार्य (प्रक्रिया) तथा तीसरे हिस्से को ‘चिंतनशील सोच’ के रूप में देखना. (यहाँ आकलन को शिक्षण प्रक्रिया के हिस्से के रूप में देखा गया है) कक्षा शिक्षण में इसका उद्देश्य और तैयारी के चक्र को सम्झना होगा।
कक्षा शिक्षण में कार्य की पूर्व तैयारी को सामान्य ढंग से देखने से तो सिर्फ यह दिखाई पड़ता है कि विषयगत पाठ जिसको पढ़ाना है, को एक बार ध्यान से पढ़ लिया जाए. यदि हम शिक्षण को एक कौशल के रूप में देखें तो कक्षा शिक्षण के उद्देश्य और तैयारी महत्वपूर्ण हो जाता है. यहाँ अभ्यास से आशय हैं शिक्षण कार्य को करते हुए उसमें निखार लाना. ऐसा संभव नहीं है कि पहले इसका अभ्यास कर लिया जाए फिर बाद में शिक्षण कार्य को प्रारम्भ करें. जिस तरह तैरना सीखने के लिए तैरना अनिवार्य शर्त है उसी तरह शिक्षण में पारंगत होने की अनिवार्य शर्त है शिक्षण कार्य में स्वयं को लिप्त करना और ऐसा करके ही शिक्षण कार्य में पारंगतता हासिल किया जा सकता है. कक्षा शिक्षण की तैयारी तीन तरह के प्रश्न पूछते हुये की जा सकती है-
· शिक्षा के क्या उद्देश्य हैं? जो मूलतः इससे निर्धारित होते हैं कि किस प्रकार का समाज हमें चाहिए?
· जिस विषय का शिक्षण कार्य किया जाना है उस विषय को पढ़ाने के क्या उद्देश्य हैं? उस विषय के माध्यम से बच्चों में किन कौशलों व क्षमताओं का विकास किया जाना है? (इसे सहूलियत के लिए ‘विषयगत उद्देश्य’ कह सकते हैं)
· विषयगत उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किस विषयवस्तु को माध्यम बनाया गया है? किस विषयवस्तु पर समझ बनाने की कोशिश की गयी है? (इसे सहूलियत के लिए पाठगत उद्देश्य कह सकते हैं)

कक्षा शिक्षण की पूर्व तैयारी
सबसे पहले शिक्षा के उद्देश्यों को शिक्षण कार्य के पूर्व तैयारी के रूप देखते हैं. इसके लिए स्कूल और समाज के मध्य सम्बन्ध तथा शिक्षा के संवैधानिक मूल्यों पर विचार करना महत्वपूर्ण हो सकता है. हम किस प्रकार का समाज स्थापित / विकसित करना चाहते हैं. इस प्रकार के शैक्षिक लक्ष्यों में जिस पर लगातार लम्बे समय तक कार्य करने के बाद ही कह सकते हैं कि हम उस शैक्षिक लक्ष्य तक पहुँच पाए या नहीं. उदाहरण के लिए यदि हमारा शैक्षिक लक्ष्य ‘न्याय पर आधारित समाज की स्थापना’ करना है तो हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि न्याय से हमारा आशय क्या है. क्या जाति, धर्म, लिंग में भेद किए बिना सबके अधिकारों की रक्षा करना न्याय है? क्या ऐसे समाज को देखना जहां शान्ति डर एवं भय से नहीं बल्कि एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हुए समाज में शान्ति स्थापित करना है? ऐसे कई तरीकों से हमें न्याय को परिभाषित करना होगा. उसके बाद हमें इस पर विचार करना होगा कि जितनी देर कक्षा में बच्चों के साथ अंतर्क्रिया होगी उसमें शिक्षक का व्यवहार कैसा होगा, उसे किन-किन बातों को ध्यान रखना होगा। ऐसे अन्य कई पहलुओं पर भी विचार करना होगा. जैसे शिक्षक और बच्चों के मध्य या बच्चों और बच्चों के मध्य की अंतर्क्रिया में कहीं जाति, धर्म, लिंग आधारित भेदभाव पूर्ण व्यवहार (अनजाने में भी) तो नहीं हो रहा है. कक्षा शिक्षण: उद्देश्य-तैयारी के लिए ये सब जरूरी है।
शिक्षा के सामान्य उद्देश्य
कक्षा शिक्षण में उद्देश्यों व तैयारी के मद्देनजर शिक्षकों को पाठ्यक्रम के सभी घटकों को ध्यान रखना होता है। जबकि वे किसी विषयवस्तु पर कार्य करते हुए शिक्षा के सामान्य उद्देश्यों को अनजाने में ही सही, भूल जाते हैं और उन्हें कक्षा में स्थान नहीं दे पाते. जैसे जब कोई शिक्षक ‘नक्शा पढ़ना’ सिखा रहा होता है तो पूरा ध्यान नक़्शे का ‘पठन कौशल’ को विकसित करना मुख्य उद्देश्य हो जाता है जबकि शिक्षण के हर क्षण हमें शिक्षा के सामान्य उद्देश्यों (जिसके लिए शिक्षा तंत्र विकसित हुआ है) को जो लम्बे समय अंतराल के बाद पूरा होना होता है, को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए. उदाहरण के लिए यहाँ यह देखा जाना महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या बच्चे नक़्शे का ‘पठन कौशल’ का उपयोग एक-दूसरे से सहयोगात्मक ढंग से सीखने में कर रहे हैं या नहीं. यही ‘सहयोग की भावना’ वयस्क समाज को वांछित समाज की और ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है. इस प्रकार शिक्षण की पहली तैयारी में शिक्षा के सामान्य उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कैसे कार्य किया जाना होगा पर गंभीरता पूर्वक विचार कर लेना चाहिए.
कक्षा शिक्षण के विषयगत उद्देश्य
अभी हमने शिक्षण की तैयारी के लिए उठाए गए तीन प्रश्नों में से पहला प्रश्न ‘शिक्षा के क्या उद्देश्य है’ पर कुछ उदाहरणों के साथ विचार करने का प्रयास किया है. अब हम इसके दूसरे प्रश्न ‘जिस विषय का शिक्षण कार्य किया जाना है उसकी प्रकृति क्या है तथा उस विषय को पढ़ाने के क्या उद्देश्य हैं? इस विषय के माध्यम से बच्चों में किन कौशलों व क्षमताओं का विकास किया जाना है? जिसे हमने सहूलियत के लिए विषयगत उद्देश्य का नाम दिया है, पर विचार करते हैं कि आखिर विषयगत उद्देश्य के तहत शिक्षण की क्या तैयारी की जा सकती है.
जैसे- गणित पढ़ाने का उद्देश्य हो सकता है बच्चों में तार्किक क्षमता का विकास करना, अपने दैनिक जीवन की समस्याओं को गणितीय ढंग से सुलझा पाना आदि. भाषा पढ़ाने का उद्देश्य हो सकता है कि बच्चे स्वतंत्र रूप से विचार कर सकें, अपनी बातों को निर्भीकता से दूसरों के समक्ष रख सके आदि. इसी तरह सामाजिक विज्ञान को पढ़ाने का उद्देश्य हो सकता है कि बच्चे समाज में घट रही विभिन्न घटनाओं के मध्य संबंधों को देख सके.
विज्ञान विषय का उद्देश्य
विज्ञान का उद्देश्य हो सकता है कि बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा हो. इन्हीं सब उद्देश्यों के आधार पर कक्षागत अभ्यास का नियोजन करना शिक्षण का महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है, जिसके आधार पर कक्षा में की जाने वाली गतिविधियों को दिशा प्रदान की जा सकती है, सहायक शिक्षण सामग्री का विवेक सम्मत उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है.
सामाजिक विज्ञान
इसमे इतिहास, राजनीतिशास्त्र एवं भूगोल जैसे विषयों को समाहित किया जाता है.
आगे अपनी बात को बढ़ाने के लिए भूगोल विषय के अनेक उद्देश्यों में से एक बृहद उद्देश्य ‘विभिन्न घटनाओं के मध्य आपसी संबंधों को समझना’ को एक उदाहरण के रूप में ले सकते हैं- जैसे किसी स्थान की धरातलीय संरचना का वहाँ होने वाली वर्षा की मात्रा के साथ क्या सम्बन्ध होते हैं तथा वर्षा का वहाँ होने वाली फसलों के साथ क्या सम्बन्ध होंगे अर्थात वहाँ किस तरह की फसलें उगाई जाती है? आदि.
कक्षा शिक्षण के उद्देश्यों व तैयारी में कुछ कौशलों का विकास
इसी तरह कक्षा शिक्षण के उद्देश्यों व तैयारी में कुछ कौशलों का विकास करना भी इस विषय का एक महत्वपूर्ण विषयगत उद्देश्य है. उदाहरण के लिए ‘नक्शा पठन’ का कौशल. यदि हमारा भूगोल पढ़ाने का ‘विषयगत’ उद्देश्य बच्चों में नक़्शे का पठन कौशल विकसित करना है तो हमारी कक्षा संचालन की तैयारी में विभिन्न देशों (स्तरानुसार) के नक़्शे को मुख्य शिक्षण सामग्री के रूप में चयन करना होगा. यह देखना होगा कि बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तकों में मुद्रित नक़्शे का उपयोग किस तरह से हो. नक़्शे पढ़ने के सभी आवश्यक घटकों (दिशा, पैमाने, संकेत चिन्ह, रंग आदि) पर बच्चों में समझ विकसित करने संबंधी गतिविधियों का नियोजन करना होगा. यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस पठन कौशल को विकसित करने के लिए बच्चों को व्यक्तिगत कार्य करने का अवसर, जोड़ी में कार्य करने का अवसर एवं समूह में कार्य करने का अवसर कहाँ-कहाँ व किस तरह देना होगा / दिया जा सकता है. इस प्रकार विषयगत उद्देश्य यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि कक्षा संचालन की तैयारी किस तरह की जानी चाहिए.
कक्षा शिक्षण के पाठगत उद्देश्य – विषयवस्तु
अब हम शिक्षण की तैयारी के लिए उठाए गए तीन प्रश्नों में से तीसरा एवं अंतिम प्रश्न ‘विषयगत उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किस विषयवस्तु को माध्यम बनाया गया है? किस विषयवस्तु पर समझ बनाने की कोशिश की गई है?’ पर विचार करते हैं. जैसा कि प्रश्न में ही कहा गया है कि विषयगत उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किस ‘विषयवस्तु’ को माध्यम बनाया गया है? यहाँ हम भूगोल विषय में ‘अफ्रीका महाद्वीप’ को पाठगत विषयवस्तु (माध्यम) के रूप लेते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं. इस विषयवस्तु में निश्चित ही विषयगत उद्देश्य ‘नक़्शे का पठन कौशल’ तो है ही पर साथ में यह समझ भी विकसित करना अवश्यम्भावी हो जाता है कि बच्चे अफ्रीका महाद्वीप की भौतिक संरचना को इस आशय के साथ समझे कि यह वहाँ के जलवायु, वर्षा, जनजीवन आदि को किस तरह प्रभावित करता है. इस तरह ये सभी इसके पाठगत उद्देश्य कहे जाजाएँगे अतः इन पाठगत उद्देश्यों को ध्यान में रखकर कक्षा की गतिविधियों को दिशा देना होगा।. जैसे बच्चों को यह अवसर देना कि सभी बच्चे व्यक्तिगत कार्य के रूप में नक़्शे का पठन कौशल का उपयोग करते हुए अफ्रीका महाद्वीप के भौतिक भागों का वर्णन करें, इसे जोड़ी में या छोटे-छोटे समूहों में कार्य कराने की लिए भी गतिविधियों का नियोजन की जा सकती है. यहाँ शिक्षक की स्वायत्तता है कि विषयवस्तु पर कार्य करने की तैयारी किस प्रकार करता है.
शिक्षण प्रक्रिया
इस लेख के प्रारम्भ में ही हमने ‘शिक्षण चक्र’ शब्द का उपयोग किया है और इस चक्र के पहले हिस्से के रूप में ‘शिक्षण कार्य के पूर्व तैयारी, पर काफी बातचीत कर चुके हैं. अब हम इस चक्र के दूसरे हिस्से ‘शिक्षण कार्य (प्रक्रिया)’ पर बात करते हैं, अर्थात अब हम उपरोक्त तैयारी के बाद कक्षा में शिक्षण कार्य के लिए प्रवेश करते हैं. जब हम कक्षा में प्रवेश करते हैं तो हमें सबसे पहले जिस पर विचार करना श्रेयस्कर हो सकता है वह है – ‘कक्षा का वातावरण’।
सीखने का वातावरण
यह सर्वमान्य है कि बच्चों का अच्छा सीखना एक कक्षा के अच्छे वातावरण में संभव होता है. यहाँ अच्छा वातावरण से आशय एक ऐसे स्थल से है जहां बच्चों का देखभाल होता हो वह भी लिंग-जाति-धर्म-सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि पर भेदभाव किए बिना. एक ऐसा स्थल जहां शिक्षक और बच्चों के मध्य तथा बच्चों-बच्चों के मध्य अंतर्क्रिया करने का पूरा अवसर उपलब्ध होता हो. जहां बच्चे यह उम्मीद करते हों कि शिक्षक उन्हें सीखने की सभी गतिविधियों में शामिल करेंगे. जहां बच्चों के अनुभव एवं पूर्व ज्ञान का सम्मान किया जाता हो. जहां बच्चे बिना डर-भय के अपनी बात कक्षा में रख सकते हों. जहां बच्चों द्वारा त्रुटियों को सीखने की सीढ़ी के रूप में देखा जाता हो. जहां बच्चे एक दूसरे के सहयोग को सीखने की प्रक्रिया में शामिल करते हों.
कक्षा का संचालन
अब बारी आती है शिक्षक के द्वारा अपने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार कक्षा के संचालन की. कक्षा संचालन के दौरान की जाने वाली अनेक गतिविधियों को मुख्य रूप से दो भागों में रखा जा सकता है. एक वे गतिविधियां जिन्हें सीधे शैक्षिक प्रक्रिया के रूप में देख सकते हैं और एक वे जिन्हें कक्षा में आवश्यक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए काम में लाते हैं.
बच्चों को गतिविधियों के अनुरूप बिठाना, पुस्तक खोलने के लिए कहना, शार्पनर से पेन्सिल में धार करने के लिए कहना, बच्चों से चाक मंगवाना आदि ऐसे कुछ काम हैं जिन्हें हम शिक्षण की विशिष्ट गतिविधियाँ नहीं कह सकते बल्कि बच्चों द्वारा आपस में किसी मुद्दे पर चर्चा करने, खोज करने, शिक्षक के द्वारा किसी विषय पर व्याख्यान देने जैसी गतिविधियों को विशिष्ट शैक्षिक गतिविधियों के रूप में देखा जा सकता है.
कक्षा संचालन की इन गतिविधियों में पढ़ाये जाने वाले विषय के लिए बच्चों के पूर्व ज्ञान को टटोलना, उन्हें उनके पूर्व ज्ञान को व्यक्त करने का अवसर देना भी महत्वपूर्ण है. कक्षा संचालन के दौरान शिक्षण सहायक सामग्री के उपयोग के बारे में बहुत सी भ्रांतियां शिक्षकों में अभी भी मौजूद है. जैसे भूगोल में ग्लोब की समझ पर आधारित पाठ में पूरी कक्षा के लिए सिर्फ ‘एक’ ग्लोब का उपयोग करते हुए शिक्षक ये मान लेता है कि पूरी कक्षा में एक ग्लोब के उपयोग द्वारा अपेक्षित विषयवस्तु की समझ विकसित हो गयी. जबकि केवल उन्हीं बच्चों में थोड़ी बहुत समझ विकसित होती है जिन्हें ग्लोब को छूकर-पास से देखकर समझने का अवसर मिलता है.
छोटे-छोटे समूहों में बच्चे ग्लोब लेकर कार्य करें ऐसे अवसर देने के लिए एक कक्षा में एक से ज्यादा ग्लोब की आवश्यकता होगी. इस प्रकार बच्चों में सीखने का अवसर को लेकर भेदभाव अनजाने में ही शिक्षण के दौरान हो जाता है. यह सत्य है कि कक्षा में बच्चों को सीखने का अवसर कितना मिलता है यह इस पर निर्भर करता है कि उन्हें पाठ्यक्रम / पाठ्यचर्या द्वारा निर्धारित विषयवस्तुओं की गतिविधियों में भाग लेने का कितना अवसर मिलता है. यहाँ सीखने के अवसर में ‘समता’ एवं ‘समानता’ जैसे शब्दों के असल मायने को शिक्षण के दौरान ध्यान में रखना होता है.
Co-operative Learning
कक्षा में शिक्षण के दौरान बच्चों के सीखने की प्रक्रिया और प्रकृति को भी ध्यान में रखना होता है. जब हम कहते हैं कि बच्चा स्वयं सीखता है, अपने साथी से अंतर्क्रिया करते हुए सीखता है, छोटे समूहों में सीखता है, तो सीखने की यह प्रक्रिया कक्षा में हो पाये इसके लिए कक्षा में बच्चों को अवसर देना होगा. इस प्रकार का Co-operative Learning से हम प्रभावशाली शिक्षण के साथ सामाजिक अंतर्क्रिया को प्रोत्साहित कर सकते हैं. यह बच्चों की रूचि, विषयगत मूल्य एवं उनके सकारात्मक अभिवृत्ति को भी बढाता है.
चूंकि चर्चा करना Co-operative Learning का मुख्य हिस्सा होता है ,अतः इसमें संज्ञानात्मक एवं उनके सह-संज्ञानात्मक क्षमताओं को पोषित करने, उन्हें विकसित करने की पूरी गुंजाइश होती है. जबकि परम्परागत शिक्षण प्रक्रिया में पूरी कक्षा को किसी एक ही विषयवस्तु / पाठ में एक साथ एक ही स्तर का मानकर शिक्षण कराया जाता है, साथ ही जो task बच्चों को दिए जाते हैं उसे सभी बच्चे व्यक्तिगत रूप से करते हैं जिसे एक नियत समय में करते हैं. Co-operative Learning में भी पूरी कक्षा के साथ एक साथ ही काम होता है, लेकिन इसमें बच्चों का जोड़ी में काम करना, छोटे समूहों में भागीदारी करते हुए काम करना इसे विशिष्ट बना देते हैं. यह सीखने को सार्थक बनाता है जिसे सामाजिक मूल्यों जिनकी हमने शिक्षा के सामनी मूल्यों के अंतर्गत बात की के साथभी जोड़कर देखा जा सकता है.
Co-operative Learning और सहायक सामग्री
कक्षा शिक्षण: उद्देश्य-तैयारी के अंतर्गत Co-operative Learning में विशेषकर छोटे समूहों में कार्य करने का अवसर देना कक्षा में उपलब्ध शिक्षण सहायक सामग्री पर भी निर्भर करता है. उदाहरण के लिए बच्चों में ग्लोब की समझ एवं पठन कौशल विकसित करने के लिए छोटे समूहों में ‘सीखने’ का अवसर देना है तो कक्षा में एक मात्र ग्लोब से काम नहीं चलेगा.
शिक्षण रणनीति में सामान्य सीखना एवं पठन कौशल के अलावा अर्थ निर्माण, गणितीय समस्याओं को सुलझाना तथा वैज्ञानिक ढंग से तार्किक सोच के लिए शिक्षण करना शिक्षण का मुख्य भाग होना चाहिए. शिक्षण के दौरान सम्पूर्ण रणनीति में कुछ सवाल बच्चों के ज्ञान के सन्दर्भ में किए जा सकते हैं कि कोई ज्ञान / जानकारी को बच्चे कितना जानते है, कैसे जानते हैं, तथा इस समझ या जानकारी को कब, क्यों और किन परिस्थितियों में उपयोग कर सकते हैं. इस तरह की रणनीति से शिक्षण को पुख्ता बनाया जा सकता है. इस प्रकार कक्षा शिक्षण: उद्देश्य-तैयारी में सहायक सामग्री की उपलब्धता पर भी ध्यान रखना होगा।
जैसा कि लेख के प्रारम्भ में ही कहा गया है कि ‘आकलन’ शिक्षण प्रक्रिया में सम्मिलित है जो सतत चलता है तो इसके लिए यह जरूरी हो जाता है कि एक शिक्षक अपनी शिक्षण प्रक्रिया के दौरान सभी बच्चों का यथोचित अवलोकन करता रहे. और अभ्यास और अनुप्रयोग का अवसर बच्चों को आवश्यकतानुसार उपलब्ध कराता रहे। शिक्षक को हमेशा अनेक औपचारिक व अनौपचारिक मूल्यांकन के तरीकों को अपने शिक्षण प्रक्रिया में स्थान देना चाहिए. मूल्यांकन चाहे जिस तरीके का हो ,वह लक्ष्य आधारित होना चाहिए. यह भी सत्य है कि अच्छी तरह से विकसित पाठ्यक्रम में मूल्यांकन / आकलन के धटक स्वमेव शामिल होता है.समझ आधारित आकलन करते समय यह देखा जाना चाहिए कि बच्चे अपने उत्तरों में अपने तर्क को कितना स्थान देते है.
एक अच्छी शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक बच्चों का आकलन केवल ग्रेड देने के लिए नहीं बल्कि बच्चों की उपलब्धि को समग्रता में देखने के लिए करता है. साथ ही वह सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के दौरान ही बच्चों की उपलब्धि व उन्हें सीखने में आने वाली कठिनाइयों का सतत अनुवीक्षण करते रहता है.
कक्षा शिक्षण: उद्देश्य-तैयारी के संदर्भ में जहां तक सीखने और आकलन का सम्बन्ध है ज्यादातर बच्चों को अभ्यास के मौके और करके देखने का मौक़ा देने से वे सीखने के लिए उत्साहित नज़र आते हैं. वे अपने सीखे हुए को और अच्छा करने के लिए अभ्यास करते हैहैं बशर्ते सीखने का वातावरण शिक्षक ने बबनायाहो. आकलन की कड़ी में अभ्यास और अनुप्रयोग की दिशा में अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बच्चों को गृहकार्य देना भी एक सार्थक कदम हो सकता है. यद्यपि बच्चों को गृहकार्य देना आदर्श स्थिति में अनुचित समझा जाता है. इसके बावजूद प्रश्नों की प्रकृति और उसके कठिनाई के स्तर को ध्यान में रखकर गृहकार्य देने से अभ्यास के अवसर को बढाया जा सकता है. यह गृहकार्य ऐसा हो सकता है जिसे वह स्वतंत्र रूप से स्वयं कर सके. गृह कार्य देने के बाद यह सावधानी रखनी पड़ती है कि अगले दिन बच्चे जब शाला आए तो उसे जांचा – परखा जाए, सुधार की आवश्यकता पड़ने पर सुधारने का मौक़ा बच्चों को अवश्य दिए जाएं.
अब हम बात करते हैं कक्षा शिक्षण:उद्देश्य-तैयारी में चक्र के अंतिम हिस्से ‘चिंतनशील सोच’ (Reflective Thinking) की. यह एक कौशल है जो शिक्षक एवं शिक्षण के मध्य का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यह एक तरह का स्व-आकलन/समीक्षा जैसा कुछ है. जिसमें शिक्षक को अपने किए गए प्रयास को उद्देश्यपूर्ण उपलब्धि के साथ जोड़कर देखता है और अपने प्रयासों में लगातार सुधार करता है.
निष्कर्ष
इस प्रकार कक्षा शिक्षण: उद्देश्य-तैयारी में शिक्षा के सभी पहलुओं को देखना एक अच्छी शिक्षण प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है. आखिरकार शिक्षा तंत्र की उपादेयता इसी में है कि बच्चे का सर्वांगीण विकास हो और वे एक ऐसे समाज की रचना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सके जिसे संविधान की प्रस्तावना में संवैधानिक मूल्यों के रूप में परिकल्पित की गयी है.
|||||||||

