School Culture
विषय सूची
School Culture, Leadership and Teacher Development
“School Culture शाला की संस्कृति स्कूल के वे विश्वास, मूल्य, परंपरा एवं व्यवहार हैं जो विद्यालय के संचालन एवं विद्यार्थियों के सीखने को प्रभावित करते हैं (School culture is the beliefs, values and behavior of a school that influence the conduct of the school and the learning of the students.)”
School Culture शाला की संस्कृति अर्थात किसी स्कूल के विश्वास, मूल्य, परंपरा एवं व्यवहार स्कूल संचालन तथा बच्चों के सीखने की दृष्टि से सकारात्मक एवं नकारात्मक हो सकते हैं। एक शिक्षक को या प्रधान पाठक को एक नेतृत्वकर्ता होने के नाते इसी सकारात्मकता या नकारात्मकता की पहचान करने में सक्षम होने चाहिए। साथ ही इस तथ्य से भी परिचित होने की आवश्यकता होगी कि किस प्रकार के विश्वास, मूल्य, परंपरा एवं व्यवहार स्कूल संचालन एवं बच्चों के सीखने को प्रभावित करता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो एक नेतृत्वकर्ता के लिए ये पहचान करने का कौशल एक अनिवार्य कौशल बन जाता है। अंततः इस कौशल की सहायता से एक प्रधान पाठक / शिक्षक विद्यार्थियों को शिक्षा के अंतिम लक्ष्य जो संविधान की प्रस्तावना में परिकल्पित है, तक पहुँचने में मदद कर सकता है।

School Culture (शाला की संस्कृति) की पहचान
इसके लिए सबसे पहले किसी स्कूल में वर्तमान में प्रचलित School Culture शाला की संस्कृति की पहचान निष्पक्ष होकर करनी होगी। जिसके लिए स्कूल के प्रधान अध्यापक एवं सभी शिक्षकों को संयुक्त रूप से कार्य करना होगा। इसकी पहचान करने/शुरुआत करने के लिए हमें कुछ प्रश्न उठाने होंगे।
स्कूल संस्कृति की पहचान के लिए कुछ सवाल –
- क्या स्कूल स्तर पर लिए जाने वाले निर्णयों में बच्चे, शिक्षक, प्रधान पाठक सभी शामिल होते हैं? उदाहरण के लिए शाला में मनाए जाने वाले वार्षिक / सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रार्थना सभा / बाल सभा मनाए जाने का निर्णय।
- ऐसी सभाओं में सभी बच्चों को उनकी क्षमता व रुचि के अनुसार अवसर दिए जाते हैं?
- स्कूल में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों आदि में क्या सभी बच्चे शामिल होते हैं या अवसर दिए जाते हैं?
- जब बच्चों या शिक्षकों के बीच किसी मुद्दे को लेकर विवाद होता है उस स्थिति में विवाद का निपटारा किस प्रकार किया जाता है?
- शाला परिसर में (और बाहर भी) जब किसी बच्चे को या शिक्षक को किसी अन्य व्यक्ति की कोई वस्तु मिलती है तो आमतौर और पक्के तौर पर भी उस वस्तु का क्या किया जाता है? क्या उस वस्तु को स्कूल के कार्यालय / प्रधान पाठक की कक्ष में जमा कर दिया जाता है?
- एक-दूसरे का अभिवादन वरिष्ठता के आधार पर किया जाता है या कोई भी किसी को कर लेता है?
- यह कहा जा सकता है कि वरिष्ठता के आधार पर अभिवादन पदानुक्रम में छोटे-बड़े का एहसास कराने वाला होता है।
- अच्छी संस्कृति के तहत शिक्षक कक्षा में प्रवेश करते ही बच्चों को नमस्ते / अभिवादन करते हैं।
- कक्षा में बच्चों की बैठक व्यवस्था किसी खास नियम से संचालित होते हैं या किसी भी बच्चे को कहीं भी बैठने की आजादी होती है?
- कक्षा शिक्षण प्रक्रिया के दौरान लिंग, जाति, धर्म, वर्ग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव होता है?
- भेदभाव के बिना कक्षा में सभी को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाता है?
कुछ और सवाल
हम कुछ और सवालों के माध्यम से स्कूल की संस्कृति की पहचान करने का प्रयास करते हैं –
- शाला/कक्षा में क्या बच्चे अपनी बात निर्भीक होकर रखते हैं? राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की की रूपरेखा (एन. सी. एफ़.) 2005 में यह साफ लिखा है “शिक्षकों को अपनी कक्षाओं को ऐसी जगह बना देनी चाहिए जहां किसी चलते हुए पाठ के दौरान बच्चे खुल कर प्रश्न पूछ पाएँ और अपने सहपाठियों और शिक्षक के साथ संवाद कर पाएँ।“

School Culture and Leadership - मध्याह्न भोजन में सभी बच्चे एक साथ बैठकर ग्रहण करते हैं या कुछ समूहों के आधार पर?
- बच्चों के अभिभावक स्कूल के लिए मेहमान होते हैं या सदस्य?
- विद्यालय का सामाजिक वातावरण कैसा है अर्थात क्या बच्चे विद्यालय में सुरक्षित एवं अपनापन महसूस करते हैं?
- सभी बच्चों को अपने उच्चतम प्रदर्शन के लिए प्रेरित किया जाता है?
- बच्चों को पुस्तकालय का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहन एवं वातावरण मिलते हैं?
- शाला में सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न को समाप्त कर दिया गया है?
- विद्यालय में अनुशासन व छात्र – शिक्षक सम्बन्धों को नए सिरे से परिभाषित किया गया है?
- सीखने के लिए बच्चे (शिक्षक भी) आपस में सहयोग करते हैं?
- विद्यालय में शिक्षकों व बच्चों के लिए अपने अनुभवों को साझा करने के लिए कोई मंच है?
- छात्रों के कामों को एक निश्चित अंतराल में विशेष कर समुदाय / अभिभावकों के समक्ष प्रदर्शित करने की परंपरा है?
- विद्यालय प्रमुख से मिलने के लिए स्टाफ को – बच्चों को पूर्व अनुमति लेना पड़ता है?
- विद्यालय में प्रत्येक विद्यार्थी की अपनी मातृ भाषा का सम्मान होता है?
- स्कूल इस बात पर विश्वास करता है कि बच्चे फेल नहीं होते, बल्कि ये केवल स्कूल की असफलता है ?
उपरोक्त सवालों की सूची लंबी हो सकती है, जिसके उत्तर ईमानदारी से हाँ या नहीं में देकर अपनी शाला की संस्कृति के बारे में जाना जा सकता है कि शाला में किस सीमा तक कार्य करने की कितनी आवश्यकता है। बेहतर होगा यदि उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर में कुछ प्रमाण एकत्र कर लिए जाएँ जिससे कि सभी के मध्य अर्थात शिक्षकों व प्रधान अध्यापकों के मध्य इस दिशा में सुधारात्मक पहल करने की सहमति बन जाए। यह भी सोचा जाना चाहिए कि यदि उपरोक्त सभी सवालों के उत्तर सकारात्मक है, इसके बावजूद बच्चे अपनी आयु / कक्षा के अनुरूप नहीं सीख रहें हैं तो हमें उपरोक्त सवालों पर पुनः चिंतन और विश्लेषण करने की जरूरत होगी क्योंकि स्कूल की संस्कृति बच्चों की उपलब्धि को अनिवार्यतः प्रभावित करती है।
School Culture शाला की संस्कृति और बच्चों के सीखने के मध्य संबंध
इसे हम कुछ उदाहरणों से समझते हैं । जैसे-
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शाला स्तर पर लिए जाने वाले निर्णयों में शाला के सभी हितधारकों की सहभागिता सुनिश्चित करने से बच्चों में प्रजातांत्रिक मूल्यों के विकास की संभावनाएँ सुदृढ़ होती हैं। यहाँ हितधारकों से आशय शिक्षक, प्रधान पाठक, विद्यार्थी, अभिभावक, समुदाय तथा वे सभी व्यक्ति या समूह हैं, जो शाला में बच्चों के अधिगम एवं समग्र विकास की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से भागीदारी करते हैं या कर सकते हैं।
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सभी बच्चों द्वारा एक साथ मध्याह्न भोजन करना उनमें समानता, सहभागिता तथा बंधुत्व की भावना को प्रोत्साहित करता है। संविधान की प्रस्तावना में परिकल्पित न्यायपूर्ण, समतामूलक एवं लोकतांत्रिक समाज के निर्माण हेतु बच्चों में बंधुत्व का मूल्य अनिवार्य एवं आधारभूत माना जाता है।
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कक्षा में शिक्षण प्रक्रिया के दौरान निर्भीक होकर प्रश्न पूछने की संस्कृति बच्चों को जिज्ञासु एवं अन्वेषी बनाने में मदद करती है. यह संस्कृति उन्हें स्वयं ज्ञान के निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनने हेतु सक्षम करती है।
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इसी प्रकार, शाला में उठाए गए विविध शैक्षिक एवं व्यवस्थागत प्रश्नों पर सामूहिक चिंतन और विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक निर्णय बच्चों के अधिगम को किस प्रकार प्रभावित करता है।
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इस तरह विद्यालयी संस्कृति को अधिगम-केंद्रित बनाकर बच्चों के सीखने को एक सकारात्सुमक दिशा में सुनिश्निचित करने में मदद मिलती है. परिणामस्वरूप, संवैधानिक मूल्यों पर आधारित समाज के निर्माण की दिशा में ठोस प्रगति होती है, जो शिक्षा का मूल एवं अंतिम उद्देश्य है।
निष्कर्ष
विद्यालय केवल पाठ्यपुस्तकों के अध्ययन का स्थान नहीं होता, बल्कि वह एक जीवंत सामाजिक-सांस्कृतिक इकाई होता है जहाँ भविष्य का नागरिक आकार लेता है। शाला की संस्कृति ही यह निर्धारित करती है कि बच्चे केवल जानकारी प्राप्त करते हैं या मूल्य, दृष्टिकोण और जीवन-दृष्टि भी विकसित करते हैं। यदि विद्यालय में सहभागिता, समानता, संवाद, सम्मान, सहयोग और आत्मविश्वास का वातावरण निर्मित होता है, तो अधिगम स्वाभाविक रूप से गहरा और सार्थक बनता है।
एक सजग नेतृत्वकर्ता—चाहे वह प्रधान पाठक हो या शिक्षक—विद्यालय की संस्कृति को पहचानने, उसका विश्लेषण करने और उसे सकारात्मक दिशा देने में केंद्रीय भूमिका निभाता है। जब निर्णय प्रक्रिया में सभी हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित होती है, जब कक्षा में निर्भीक प्रश्न पूछना प्रोत्साहित किया जाता है, जब मध्याह्न भोजन समानता और बंधुत्व का अनुभव कराता है, तब विद्यालय संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों को व्यवहार में रूपांतरित करता है।
अतः यह आवश्यक है कि प्रत्येक विद्यालय अपनी संस्कृति का निरंतर आत्ममूल्यांकन करे और उसे अधिगम-केंद्रित, समावेशी एवं मूल्य-आधारित बनाए। विद्यालय की संस्कृति में किया गया प्रत्येक सकारात्मक परिवर्तन सीधे बच्चों के सीखने और उनके व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करता है। अंततः, यही प्रक्रिया एक ऐसे समाज के निर्माण की आधारशिला रखती है जो संवैधानिक मूल्यों पर आधारित, लोकतांत्रिक और मानवीय हो—और यही शिक्षा का वास्तविक एवं अंतिम उद्देश्य है।



