What is Mathematization in Teaching – वास्तविक जीवन से गणित तक
विषय सूची
- 1 What is Mathematization in Teaching – वास्तविक जीवन से गणित तक
- 2 गणितीकरण क्या है? (What is Mathematization?)
- 3 Mathematization in Teaching: वास्तविक जीवन से गणित तक का सफर: ELPS थ्योरी-
- 4 1. E – Experience (ठोस अनुभव)
- 5 2. L – Language (भाषा का उपयोग)
- 6 3. P – Picture (चित्रों के माध्यम से प्रदर्शन)
- 7 4. S – Symbol (गणितीय संकेत)
- 8 विभिन्न स्तरों पर गणितीकरण की प्रक्रिया (कक्षा 1 से 8 के उदाहरण)
- 9 प्राथमिक स्तर: कक्षा 1 से 3 (फाउंडेशनल स्टेज)
- 10 Mathematization in Teaching उच्च प्राथमिक स्तर: कक्षा 4 से 5 (प्रिपरेटरी स्टेज)
- 11 Mathematization in Teaching : मध्य स्तर: कक्षा 6 से 8 (मिडिल स्टेज)
- 12 शिक्षा में गणितीकरण का वास्तविक महत्व
- 13 निष्कर्ष (Conclusion)
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क्या आपने कभी सोचा है-
एक छोटा बच्चा जो अभी स्कूल भी नहीं जाता, वह कैसे आसानी से बता देता है कि उसे दो चॉकलेट मिली हैं या तीन? हमारे आसपास का एक सब्जी बेचने वाला बिना किसी कैलकुलेटर या गणितीय सूत्र के पल भर में पैसों का सटीक हिसाब कैसे कर लेता है? दरअसल, यह सब Mathematization in Teaching यानी गणितीकरण की प्रक्रिया का ही एक जीवंत हिस्सा है।
अक्सर कक्षाओं में गणित को एक बहुत ही कठिन, नीरस और उबाऊ विषय मान लिया जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हम बच्चों को इसे सीधे किताबों, अमूर्त संकेतों और सूत्रों (Formulas) से सिखाना शुरू कर देते हैं। लेकिन राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) और नई शिक्षा नीति (NEP) भी स्पष्ट रूप से कहती है कि स्कूली शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों को सिर्फ रटवाना नहीं, बल्कि उनके मस्तिष्क का गणितीकरण करना है।
आइए इस लेख में विस्तार से समझते हैं कि Mathematization in Teaching क्या है और वास्तविक जीवन के अनुभवों से अमूर्त गणित तक पहुँचने की यह जादुई यात्रा कक्षा में कैसे काम करती है।
गणितीकरण क्या है? (What is Mathematization?)
सरल शब्दों में कहें तो गणितीकरण की प्रक्रिया का अर्थ है—अपने आसपास की दुनिया को गणितीय नजरिए से देखना, उसे समझना और तार्किक रूप से समस्याओं को हल करना। जब कोई बच्चा या वयस्क अपने दैनिक जीवन के अनुभवों (जैसे- वस्तुओं को गिनना, आकारों को पहचानना, दूरी का अनुमान लगाना या तुलना करना) को गणितीय भाषा में व्यक्त करने लगता है, तो इसे हम गणितीकरण कहते हैं।
यदि आप [गणितीकरण क्या है और इसके प्रकार] पर एक अलग विस्तृत लेख पढ़ना चाहते हैं, तो यहाँ क्लिक करें। गणितीकरण पर एक और लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.
प्रसिद्ध गणितज्ञ डेविड व्हीलर ने गणित शिक्षण में इसके महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था:
“बहुत सारा गणित जानने की तुलना में यह जानना कहीं अधिक उपयोगी और महत्वपूर्ण है कि मस्तिष्क का गणितीकरण कैसे किया जाए।”
Mathematization in Teaching: वास्तविक जीवन से गणित तक का सफर: ELPS थ्योरी-
बच्चों को उनके वास्तविक जीवन से जोड़कर गणित सिखाने के लिए ELPS सबसे प्रभावी, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक ढांचा (Framework) माना गया है। Mathematization in Teaching की पूरी प्रक्रिया इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।
आइए इसके चारों चरणों को क्रमबद्ध तरीके से समझते हैं:
1. E – Experience (ठोस अनुभव)
- गणित की शुरुआत बच्चे के वास्तविक जीवन के ठोस अनुभवों से होनी चाहिए।
- कक्षा में सीधे संख्याएँ लिखने से बचना चाहिए।
- गिनती के लिए कंकड़, पत्तियाँ, तीलियाँ या गोटियाँ उपयोग करें।
- जोड़-घटाव का अनुभव भी ठोस वस्तुओं के माध्यम से दें।
- बच्चे वस्तुओं को छूकर और स्वयं गिनकर सीखते हैं।
- वे वस्तुओं को उलट-पलटकर उनके गुण समझते हैं।
- इस प्रक्रिया से गणितीय अवधारणाएँ स्पष्ट होती हैं।
- बच्चों के मन में अवधारणाओं का आधार मजबूत बनता है।
- ठोस अनुभव आगे के अमूर्त गणित की नींव रखते हैं।
- इससे सीखना सहज, रोचक और स्थायी बनता है।
2. L – Language (भाषा का उपयोग)
- बच्चों को पहले ठोस वस्तुओं के साथ खेलने का अवसर दें।
- इसके बाद उनके अनुभवों पर अनौपचारिक बातचीत करें।
- बातचीत बच्चों की सहज और परिचित भाषा में हो।
- शिक्षक या माता-पिता सरल प्रश्न पूछ सकते हैं।
- उदाहरण के लिए, राम के पास 3 गोटियाँ थीं।
- श्याम ने उसे 2 गोटियाँ और दे दीं।
- अब कुल गोटियाँ कितनी हुईं, यह पूछें।
- ‘और दे दीं’ जैसे शब्दों के जोड़ का अर्थ समझाते हैं।
- ‘मिला दिया’ जैसे शब्द भी जोड़ की अवधारणा स्पष्ट करते हैं।
- बच्चा अपनी भाषा में गणित को समझना शुरू करता है।
- इससे जोड़ की अवधारणा सहज रूप से आत्मसात होती है।
- गणित सीखना बच्चों के लिए सरल और अर्थपूर्ण बनता है।
3. P – Picture (चित्रों के माध्यम से प्रदर्शन)
- तीसरे चरण में ठोस वस्तुओं का उपयोग धीरे-धीरे कम किया जाता है।
- उनकी जगह चित्रों और दृश्यों का उपयोग किया जाता है।
- ब्लैकबोर्ड पर वस्तुओं के चित्र बनाए जा सकते हैं।
- कार्यपुस्तिका में भी चित्रों का प्रयोग किया जा सकता है।
- गेंदों, चॉकलेटों या पेड़ों के चित्र उपयोगी होते हैं।
- बच्चों को इन चित्रों को गिनने के लिए कहा जाता है।
- चित्रों के आधार पर जोड़-घटाव के प्रश्न भी दिए जाते हैं।
- इससे बच्चे प्रतीकों को समझने की तैयारी करते हैं।
- यह ठोस अनुभवों से आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण चरण है।
- बच्चा धीरे-धीरे अमूर्त सोच विकसित करने लगता है।
- यह प्रक्रिया गणितीय समझ को अधिक मजबूत बनाती है।
- यही अमूर्त गणित की ओर बढ़ने का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव है।
4. S – Symbol (गणितीय संकेत)
- यह गणितीकरण का अंतिम और अमूर्त चरण है।
- इस चरण में बच्चा अनुभवों को गणितीय रूप देता है।
- वह वास्तविक जीवन की स्थितियों को संख्याओं से व्यक्त करता है।
- अब कंकड़ों और चित्रों की आवश्यकता कम हो जाती है।
- बच्चा सीधे संख्याओं के साथ कार्य करना सीखता है।
- वह गणितीय प्रतीकों का अर्थ समझने लगता है।
- बच्चा 3+2=5 जैसे कथन लिख सकता है।
- वह इस कथन का अर्थ भी समझता है।
- संख्याएँ अब उसके लिए अर्थपूर्ण बन जाती हैं।
- यह ठोस अनुभवों से अमूर्त सोच तक की यात्रा है।
- इस चरण में गणितीय भाषा का उपयोग बढ़ता है।
- बच्चा आत्मविश्वास के साथ गणितीय अभिव्यक्ति करने लगता है।
विभिन्न स्तरों पर गणितीकरण की प्रक्रिया (कक्षा 1 से 8 के उदाहरण)
कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों का मानसिक और संज्ञानात्मक विकास अलग-अलग स्तरों पर होता है।
बच्चों को वास्तविक जीवन से अमूर्त गणित की ओर ले जाने की यह प्रक्रिया भी हर स्तर पर थोड़ी बदलती है। आइए देखें कि शिक्षक विभिन्न कक्षाओं में इसका व्यावहारिक उपयोग कैसे कर सकते हैं:
प्राथमिक स्तर: कक्षा 1 से 3 (फाउंडेशनल स्टेज)
इस उम्र के बच्चे पूरी तरह ठोस वस्तुओं को देखकर और छूकर ही सीखते हैं।
कक्षा गतिविधि (जोड़ की अवधारणा): शिक्षक कक्षा में बच्चों को 10-10 इमली के बीज या कंकड़ देता है और कहता है, “अपने पास 5 कंकड़ रखो, फिर उसमें 3 कंकड़ और मिला दो।”
गणितीय भाषा का विकास: बच्चा उन्हें गिनता है और कहता है, “सर, मेरे पास पहले पाँच पत्थर थे, तीन और मिलाने पर अब कुल आठ पत्थर हो गए।”
चित्र से संकेत तक की यात्रा: इसके बाद शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर पत्थरों के चित्र बनाता है और अंत में उनके नीचे संख्यात्मक रूप लिखता है: 5 + 3 = 8। बच्चा समझ जाता है कि कंकड़ों का यह खेल ही गणित में यह समीकरण है।
Mathematization in Teaching उच्च प्राथमिक स्तर: कक्षा 4 से 5 (प्रिपरेटरी स्टेज)
इस स्तर पर बच्चे बिना वस्तुओं को छुए भी कुछ हद तक मानसिक गणना करने में सक्षम हो जाते हैं। हम बच्चों के लिए सबसे कठिन मानी जाने वाली अवधारणा “भिन्न” (Fractions) का उदाहरण लेते हैं।
कक्षा गतिविधि (ठोस अनुभव): शिक्षक कक्षा में एक वास्तविक रोटी, सेब या कागज की एक गोल शीट लाता है। वह दो बच्चों को बुलाकर उस रोटी को बीच से बिल्कुल बराबर दो भागों में काट देता है।
गणितीय बातचीत: शिक्षक पूछता है, “दोनों को कितना मिला?” बच्चे कहते हैं, “आधा-आधा मिला।” शिक्षक फिर पूछता है, “अगर दोनों आधे हिस्सों को वापस जोड़ दें तो?” बच्चे तपाक से कहते हैं, “एक पूरी रोटी बन जाएगी।”
चित्र से संकेत तक की यात्रा: शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर एक वृत्त (Circle) बनाकर उसे बीच से छायांकित (Shade) करता है और बताता है कि ‘आधे’ को गणित में 1/2 लिखते हैं। इसके बाद वह बोर्ड पर समीकरण लिखता है: 1/2 + 1/2 = 1. इस तरह बच्चे रोटी के टुकड़े से सीधे भिन्न के अमूर्त समीकरण तक पहुँच जाते हैं।
Mathematization in Teaching : मध्य स्तर: कक्षा 6 से 8 (मिडिल स्टेज)
इस आयु वर्ग में बच्चे अमूर्त (Abstract) और काल्पनिक सोच विकसित करने लगते हैं। हम “बीजगणित” (Algebra) या चर संख्याएं x, y का उदाहरण लेते हैं।
कक्षा गतिविधि (दैनिक जीवन का संदर्भ): शिक्षक बच्चों के दैनिक जीवन के खर्चों पर चर्चा करता है: “मान लो, तुम दुकान पर गए। तुम्हें एक पेन की कीमत नहीं पता है। तुमने वैसे 2 पेन खरीदे और दुकानदार को 20 रुपये का नोट दिया। दुकानदार ने तुम्हें 4 रुपये वापस किए। बताओ एक पेन कितने का था?”
तार्किक गणितीय सोच: बच्चे मानसिक गणना करते हैं: “अगर 20 में से 4 वापस मिले, मतलब दोनों पेन कुल 16 रुपये के आए। अब चूंकि दो पेन 16 रुपये के हैं, तो एक पेन 8 रुपये का होगा।”
चित्र से संकेत तक की यात्रा: शिक्षक इस स्थिति को बोर्ड पर एक तराजू या बॉक्स के चित्र के माध्यम से दिखाता है:
[पेन] + [पेन] + 4 रुपये = 20 रुपये। इसके बाद शिक्षक समझाता है कि इस अज्ञात कीमत को गणित में हम x मान लेते हैं। इस प्रकार समीकरण बनता है:2x + 4 = 202x = 16x = 8बच्चे खेल-ही-खेल में बीजगणित के कठिन रैखिक समीकरणों को हल करना सीख जाते हैं।
शिक्षा में गणितीकरण का वास्तविक महत्व
कक्षा में Mathematization in Teaching के दृष्टिकोण को अपनाया जाता है, तो बच्चों में-
रटने की आदत छूटती बल्कि उनमे कई महत्वपूर्ण कौशलों का जन्म होता है:
तार्किक और विश्लेषणात्मक सोच (Logical Thinking): बच्चे गणित के सूत्रों को अंधाधुंध रटने के बजाय उनके पीछे छिपे ‘क्यों’ और ‘कैसे’ के वैज्ञानिक कारणों को ढूंढने लगते हैं।
वास्तविक समस्या समाधान क्षमता (Problem Solving): वे विद्यालय में सीखे गए गणित का उपयोग अपने दैनिक जीवन की वास्तविक समस्याओं (जैसे- बजट बनाना, समय का प्रबंधन या खरीद-बिक्री का हिसाब) में करने के योग्य बनते हैं।
गणित के प्रति भय का अंत: जब गणित नीरस किताबों से बाहर निकलकर उनके खेल, बातचीत और रोजमर्रा के अनुभवों का हिस्सा बन जाता है, तो बच्चों के मन से गणित का फोबिया या डर पूरी तरह खत्म हो जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहें तो-
सीखने का व्यावहारिक दृष्टिकोण: गणितीकरण कोई कठिन सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह गणित को सहजता से जीने का एक बेहतरीन दृष्टिकोण है।
तार्किक सोच का विकास: यह बच्चों को रट्टू तोता बनाने के बजाय एक सक्रिय और तार्किक विचारक (Active Thinker) बनाता है।
ELPS थ्योरी का महत्व: प्राथमिक स्तर पर ‘ELPS’ थ्योरी के माध्यम से बच्चों को ठोस अनुभव और भाषाई चर्चा मिलनी चाहिए।
चित्रों के भरपूर अवसर: शिक्षण प्रक्रिया में चित्रों के भरपूर अवसर देने से गणित का डर पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
पसंदीदा विषय बनना: इन सही तरीकों को अपनाने से गणित बच्चों का सबसे पसंदीदा और मजेदार विषय बन जाता है।
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