educational academic leadership

Educational Academic Leadership (शैक्षिक अकादमिक नेतृत्व): स्कूल गवर्नेंस में नेतृत्व का महत्व

नेतृत्वकर्ता या नेतृत्व (Leader or Leadership) शब्दों से हम सब भलीभांति परिचित हैं। इसी तरह शैक्षिक नेतृत्वकर्ता या अकादमिक नेतृत्वकर्ता (Educational or Academic Leader) भी हमारे लिए नए नहीं हैं। तब यह सवाल उठता है कि हम इस Educational Academic Leadership के लेख में इस पर चर्चा क्यों कर रहे हैं?

इसके लिए हमें अपने आप से कुछ ज़रूरी सवाल पूछने होंगे:

  • क्या हमारे बच्चे अपनी आयु के अनुरूप सीख रहे हैं?

  • क्या स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति नियमित रहती है?

  • क्या शिक्षक सभी बच्चों को सीखने का समान अवसर दे पाते हैं?

  • क्या हमारे शिक्षक स्वयं नए शोध और प्रयोग करते हैं?

  • क्या शिक्षकों को नियमित अकादमिक मार्गदर्शन मिलता है?

  • क्या स्कूलों को मिलने वाला नेतृत्व सही दिशा में है?

इन सवालों का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि शिक्षकों की मेहनत में कोई कमी है। कोरोना काल में शिक्षकों ने अपनी क्षमता को साबित किया है। सही मार्गदर्शन मिलने पर वे हर परिस्थिति में बच्चों को पढ़ा सकते हैं। हालांकि, महामारी के बाद बच्चों की पढ़ाई का काफी नुकसान हुआ है।

राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) के संकेत और जमीनी हकीकत

शैक्षिक अकादमिक नेतृत्व Educational Academic Leadership को समझने के लिए हमें जमीनी आंकड़ों को देखना होगा। शिक्षा मंत्रालय के राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि बच्चों का सीखने का स्तर उम्मीद से कम है।

कोरोना काल के बाद हुए सर्वेक्षणों के अनुसार, देश और राज्य स्तर पर औसत प्रदर्शन इस प्रकार रहा है:

प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर बच्चों का प्रदर्शन

Educational Academiv Leadership

ये परिणाम बताते हैं कि बच्चे स्कूलों में आशा के अनुरूप नहीं सीख पा रहे हैं। जबकि हमारे पास संकुल (10-12 स्कूलों का समूह) से लेकर राज्य स्तर तक एक पूरी व्यवस्था काम कर रही है।

संकुल स्तर पर ‘संकुल समन्वयक’ तैनात होते हैं। उनका मुख्य काम शिक्षकों को अकादमिक मार्गदर्शन देना है। विकासखंड स्तर पर ‘विकासखंड स्रोत समन्वयक’ (BRC) होते हैं। जिला स्तर पर जिला शिक्षा व प्रशिक्षण संस्थान (DIET) काम करता है। यह संस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (SCERT) के दिशा-निर्देशों पर चलता है।

कमजोर शैक्षणिक स्तर के मुख्य कारण

स्कूल गवर्नेंस में नेतृत्व की कमियों के कारण अक्सर बच्चों का प्रदर्शन कमजोर रह जाता है। इसके कुछ संभावित कारण निम्नलिखित हैं:

  1. शालाओं में बच्चों के सीखने की वास्तविक अवधि कम होती है।

  2. विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में विषयवार शिक्षकों की कमी।

  3. शिक्षकों के पेशेवर विकास के अवसरों में कमी।

  4. संकुल स्तर से शिक्षकों को लगातार अकादमिक मार्गदर्शन न मिलना।

  5. संकुल समन्वयकों का डेटा इकट्ठा करने जैसे गैर-अकादमिक कार्यों में व्यस्त रहना।

  6. स्कूल और जिला स्तर पर मजबूत अकादमिक योजना का अभाव।

स्कूल गवर्नेंस और अकादमिक नेतृत्व की मुख्य चुनौतियाँ

बच्चों के सीखने के स्तर को सुधारने की राह में कई चुनौतियाँ हैं। इन्हें हम दो स्तरों पर समझ सकते हैं:

1. स्कूल एवं संकुल स्तर पर Educational Academic Leadership की चुनौतियाँ

  • शिक्षकों को स्कूल स्तर पर निरंतर और सही अकादमिक मार्गदर्शन देना।

  • साल भर में वास्तविक शिक्षण के दिनों और घंटों को बढ़ाना।

  • कक्षाओं में बच्चों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना।

  • सीखने के प्रतिफल (Learning Outcomes), शिक्षण शास्त्र और मूल्यांकन में तालमेल बिठाना।

  • समावेशी शिक्षा के लिए शिक्षकों की क्षमताओं को बढ़ाना।

  • शोध और नवाचार के लिए शिक्षकों और प्रधान पाठकों को स्वायत्तता देना।

  • शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त रखना।

2. विकासखंड, जिला एवं राज्य स्तर पर Educational Academic Leadership की चुनौतियाँ

  • स्थानीय परिवेश के अनुसार निर्णय लेने के लिए स्कूलों को स्वतंत्रता देना।

  • संकुल स्तर पर खाली पदों को भरना और विषयवार शिक्षकों की नियुक्ति करना।

  • प्रशासनिक अधिकारियों के लिए अकादमिक नेतृत्व का अनिवार्य कोर्स शुरू करना।

  • जिला स्तर की डाइट (DIET) संस्थाओं में स्कूल प्रशासन विशेषज्ञों की नियुक्ति करना।

  • राज्य स्तर पर काम करने वाली अलग-अलग संस्थाओं में आपसी समन्वय बढ़ाना।

  • शैक्षिक नेतृत्व की ज़िम्मेदारी केवल वरिष्ठता के बजाय योग्यता के आधार पर तय करना।

निष्कर्ष: बदलाव के लिए आगे की राह

उपरोक्त चुनौतियों पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। पूरी शिक्षा प्रणाली के लिए शैक्षिक अकादमिक नेतृत्व पर विशेष काम करना होगा। हमें शिक्षकों को सिर्फ एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक नेतृत्वकर्ता के रूप में तैयार करना होगा।

संकुल समन्वयकों और विकासखंड समन्वयकों को सच्चे अकादमिक मार्गदर्शक की भूमिका निभानी होगी। स्कूल शिक्षा से जुड़े सभी हितधारकों में प्रशासनिक कौशल के साथ-साथ शैक्षणिक नेतृत्व का ज्ञान होना अनिवार्य है।

आगे भाग-2 में देखिए:

हम अगले भाग में चर्चा करेंगे कि शिक्षकों और समन्वयकों में कौन-कौन से कौशल विकसित करना बच्चों के भविष्य के लिए सबसे ज्यादा लाभदायक होगा। (क्रमशः…)

इसे भी पढ़ें-

Effective School Leadership Skills

इस विषय पर अधिक गहराई से समझने के लिए आप अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के अनुवाद संपदा पोर्टल पर उपलब्ध लेख ‘स्कूल एवं नेतृत्व – एक समीक्षात्मक दृष्टि’ को [यहाँ क्लिक करके (लिंक)] पढ़ सकते हैं।”


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By rstedu

Radhe Shyam Thawait is an education specialist, consultant, Freelancer and trainer with 35+ years of experience in teaching, policy, and academic leadership. He is also a content creator and shares practical insights for educators through RSTedu.in.

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