आखिर हमें Educational-Academic Leadership की बात क्यों करनी चाहिए?
आप किसी स्कूल के प्रधानाध्यापक हैं, संकुल समन्वयक हैं या विकासखंड स्तर पर शिक्षकों के साथ काम करते हैं। हो सकता है आप जिला या राज्य स्तर पर शैक्षिक योजना और प्रशिक्षण से जुड़े हों। तब एक सवाल आपसे भी है।
क्या हमारे बच्चे अपनी आयु और कक्षा के अनुरूप सीख पा रहे हैं?
यदि आपका उत्तर पूरी तरह “हाँ” नहीं है, तो हमें थोड़ा रुककर सोचना होगा।
क्या बच्चों की उपस्थिति नियमित है? हमारे शिक्षक सभी बच्चों को सीखने का समान अवसर दे पा रहे हैं? क्या शिक्षक स्वयं पढ़ते हैं, शोध करते हैं और कक्षा में नए प्रयोग करते हैं? क्या उन्हें नियमित अकादमिक मार्गदर्शन मिलता है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—क्या हमारे स्कूलों को मिलने वाला शैक्षिक नेतृत्व सही दिशा में है?
यहाँ मेरा उद्देश्य किसी शिक्षक एवं नेतृत्वकर्ता की मेहनत पर सवाल उठाना नहीं है। बल्कि सवाल उस पूरी व्यवस्था से है, जो शिक्षक और विद्यालय को सीखने तथा बेहतर करने में सहायता देती है।
यही वह जगह है जहाँ Educational-Academic Leadership महत्वपूर्ण हो जाता है।
इस लेख में हम समझने की कोशिश करेंगे कि शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व की आवश्यकता क्यों है, वर्तमान व्यवस्था में कौन-सी चुनौतियाँ हैं और बच्चों के सीखने में सुधार के लिए हमें किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व से हमारा क्या आशय है?
सरल शब्दों में कहें तो शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व वह नेतृत्व है जो विद्यालय के प्रशासन के साथ-साथ बच्चों के वास्तविक सीखने, शिक्षक के पेशेवर विकास और शिक्षण-अधिगम की गुणवत्ता को दिशा देता है।
यह केवल बैठक लेने, निर्देश जारी करने या रिपोर्ट तैयार करने तक सीमित नहीं है। इसमें पाठ्यचर्या, शिक्षण, आकलन, सीखने के प्रतिफल, शिक्षक सहयोग, कक्षा-अवलोकन, नवाचार और विद्यालय सुधार जैसे पहलू शामिल हैं।
इसे आप इस तरह समझ सकते हैं—
प्रशासनिक नेतृत्व पूछता है—“काम हुआ या नहीं?”
जबकि अकादमिक नेतृत्व आगे पूछता है—“इस काम से बच्चों को सीखने में मदद मिली?
यही अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
बच्चों के सीखने की स्थिति हमें क्या संकेत देती है?
हम जब शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व की बात करते हैं, तो केवल अपनी धारणाओं के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। हमें उपलब्ध शैक्षिक आँकड़ों और शोध को भी देखना होगा।
इस संदर्भ में PARAKH Rashtriya Sarvekshan 2024 हमारे लिए एक महत्वपूर्ण आधार देता है। यह सर्वेक्षण PARAKH, NCERT द्वारा देशभर में किया गया। इसमें कक्षा 3, 6 और 9 के बच्चों की विभिन्न विषयों में दक्षताओं का आकलन किया गया। सर्वेक्षण में 36 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के 781 जिलों से 74,229 स्कूल और 21 लाख से अधिक बच्चे शामिल हुए। साथ ही, 2.70 लाख से अधिक शिक्षकों और स्कूल नेतृत्वकर्ताओं ने प्रश्नावली के माध्यम से जानकारी दी।
अब जरा राष्ट्रीय परिणामों पर नजर डालिए।
कक्षा 3 में भाषा का राष्ट्रीय औसत प्रदर्शन लगभग 64 प्रतिशत और गणित का 60 प्रतिशत रहा।
भाषा में कक्षा 6 में यह औसत लगभग 57 प्रतिशत, गणित में 46 प्रतिशत और The World Around Us में 49 प्रतिशत रहा। इन तीनों में गणित का प्रदर्शन सबसे कम रहा।
कक्षा 9 में भाषा का औसत प्रदर्शन लगभग 54 प्रतिशत, गणित में 37 प्रतिशत, विज्ञान में 40 प्रतिशत और सामाजिक विज्ञान में 40 प्रतिशत रहा। यहाँ भी गणित का प्रदर्शन सबसे कम रहा।
अब इन आँकड़ों को केवल यह कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा कि “बच्चों की उपलब्धि कम है।”
हमें थोड़ा और गहराई से सोचना होगा।
मसलन, कक्षा 6 में दैनिक जीवन में भिन्नों को समझने और उनका उपयोग करने वाली एक दक्षता में राष्ट्रीय स्तर पर सही उत्तर देने का औसत केवल 29 प्रतिशत रहा। कक्षा 9 में प्रतिशत की अवधारणा को समझकर उसका समस्याओं में उपयोग करने वाली दक्षता में यह औसत केवल 28 प्रतिशत था।
तो सवाल केवल यह नहीं है कि बच्चे कहाँ खड़े हैं?
सवाल यह भी है कि वे वहाँ तक क्यों नहीं पहुँच पा रहे हैं, जहां तक हमारी अपेक्षाएं हैं और उन्हें आगे ले जाने के लिए हमारी शैक्षिक व्यवस्था में और किस दिशा में नेतृत्व पर विचार करने की जरुरत है?
क्या हमारे स्कूलों में बच्चों की सीखने की जरूरतों को नियमित रूप से समझा और विश्लेषित किया जा रहा है?
क्या शिक्षक को उस विश्लेषण के आधार पर अकादमिक सहयोग मिल रहा है?
क्या संकुल या अन्य अकादमिक सहयोग व्यवस्था में बच्चों के सीखने के आँकड़ों पर बैठकर चर्चा होती है?
क्या हमारी अकादमिक योजना वास्तव में कक्षा में दिखाई देती है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या हमारी वर्तमान शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व व्यवस्था इन सवालों के उत्तर खोजने में शिक्षक और विद्यालय की मदद कर पा रही है?
यही प्रश्न हमें शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व की ओर ले जाता है।
विद्यालय से राज्य तक शैक्षिक नेतृत्व की व्यवस्था

हमारे यहाँ विद्यालयों को अकादमिक सहयोग देने के लिए एक पूरी संरचना मौजूद है।
विद्यालय स्तर पर शिक्षक और प्रधानाध्यापक हैं। संकुल स्तर पर संकुल समन्वयक-संकुल प्रभारी हैं। विकासखंड स्तर पर स्रोत व्यक्ति और समन्वय की व्यवस्था है। जिला स्तर पर DIET जैसी संस्थाएँ हैं। राज्य स्तर पर SCERT जैसी शैक्षणिक संस्था मार्गदर्शन देती है।
अर्थात व्यवस्था की कमी मात्र समस्या नहीं है।
फिर सवाल यह है—
क्या इस पूरी व्यवस्था की भूमिका स्पष्ट रूप से “बच्चों के सीखने में सुधार” से जुड़ी हुई है?
और क्या प्रत्येक स्तर पर कार्यरत हितधारकों के पास इसके लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल, समय और स्वायत्तता है?
यहीं से हमें अपनी व्यवस्था पर थोड़ा गंभीरता से विचार करना चाहिए।
बच्चों के सीखने में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है?
हम यहाँ किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं मान सकते। बच्चों के सीखने पर कई कारक एक साथ प्रभाव डालते हैं।
कुछ संभावित कारणों पर हम विचार कर सकते हैं—
- स्कूल में बच्चों के वास्तविक सीखने-शिक्षण के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध न होना।
- बच्चों की संख्या के अनुरूप शिक्षकों या विषयवार शिक्षकों की उपलब्धता में कमी।
- शिक्षकों के सतत पेशेवर विकास के लिए पर्याप्त अवसर न होना।
- संकुल स्तर पर निरंतर और प्रत्यक्ष अकादमिक सहयोग का अभाव।
- संकुल समन्वयकों का अकादमिक कार्य के साथ अनेक गैर-अकादमिक कार्यों में अधिक समय लगना।
- बच्चों की सीखने की स्थिति के आधार पर अकादमिक योजना में पर्याप्त बदलाव न होना।
- शाला, संकुल, विकासखंड, जिला और राज्य स्तर पर योजनाओं के बीच पर्याप्त alignment न होना।
इनमें से किसी एक कारण को पकड़कर समाधान निकालना आसान लग सकता है। लेकिन वास्तविक सुधार के लिए हमें पूरी व्यवस्था को एक साथ देखना होगा।
School और Cluster Level पर हमारी प्रमुख चुनौतियाँ
अब आप अपने स्कूल या संकुल को सामने रखकर सोचिए।
क्या हमारे शिक्षक को जरूरत पड़ने पर तुरंत अकादमिक सहयोग मिल सकता है?
यदि किसी शिक्षक को गणित पढ़ाने में समस्या आ रही है, तो क्या संकुल स्तर पर कोई उसके साथ बैठकर कक्षा की समस्या समझ सकता है?
यदि किसी कक्षा में बच्चे लगातार पीछे रह रहे हैं, तो क्या हम केवल परीक्षा के अंक देखते हैं या यह भी समझते हैं कि बच्चे कहाँ और क्यों अटक रहे हैं?
यहीं कुछ प्रमुख चुनौतियाँ सामने आती हैं—
- शिक्षकों को निरंतर, प्रत्यक्ष और उपयोगी अकादमिक मार्गदर्शन देना।
- वर्ष भर वास्तविक शिक्षण अवधि को बढ़ाना।
- बच्चों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना।
- सीखने के प्रतिफल, शिक्षणशास्त्र और आकलन में alignment स्थापित करना।
- समावेशी शिक्षा के लिए शिक्षकों और संकुल समन्वयकों की क्षमता बढ़ाना।
- बच्चों के सीखने के स्तर के विश्लेषण, शोध और नवाचार के लिए पर्याप्त स्वायत्तता देना।
- अल्पकालीन और दीर्घकालीन अकादमिक योजना बनाने में संकुल को अधिक सक्षम बनाना।
- प्रधानाध्यापकों और संकुल समन्वयकों के लिए स्कूल प्रशासन एवं नेतृत्व का आवश्यक प्रशिक्षण सुनिश्चित करना।
- शिक्षकों को गैर-शिक्षकीय कार्यों के बोझ से यथासंभव मुक्त रखना।
- बहुभाषी कक्षाओं में बच्चों की भाषायी विविधता के अनुरूप शिक्षण रणनीतियाँ विकसित करना।
आप अपने स्कूल या संकुल के संदर्भ में इन चुनौतियों में से किन 4 को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं? कमेंट बॉक्स में हमें जरूर बताइए।
विकासखंड-जिला-राज्य स्तर पर क्या सोचना होगा?
अब जरा अपने स्तर से ऊपर की व्यवस्था को भी देखिए।
यदि हम चाहते हैं कि विद्यालय अपने स्तर पर बेहतर निर्णय लें, तो उन्हें कुछ स्वायत्तता भी देनी होगी।
राज्य लक्ष्य निर्धारित कर सकता है। जिला और विकासखंड सहयोग दे सकते हैं। लेकिन विद्यालय को स्थानीय परिस्थिति के अनुसार यह तय करने का अवसर भी मिलना चाहिए कि वह उस लक्ष्य तक कैसे पहुँचेगा।
इस स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—
- क्या विद्यालय नेतृत्व को पर्याप्त निर्णय लेने की स्वायत्तता है?
- क्या विषयवार शिक्षक आवश्यकता के अनुसार उपलब्ध हैं?
- क्या विभिन्न स्तरों के अधिकारियों के लिए शैक्षिक नेतृत्व का अनिवार्य capacity building या certification है?
- क्या अनुवीक्षण (monitoring) वास्तव में शैक्षिक सुधार से जुड़ा है?
- क्या स्कूलों को शैक्षिक सामग्री समय पर मिलती है?
- क्या DIET में स्कूल नेतृत्व और अकादमिक नेतृत्व के विशेषज्ञ उपलब्ध हैं?
- क्या विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के प्रयासों में पर्याप्त समन्वय है?
- क्या नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल वरिष्ठता के आधार पर दी जाती है या योग्यता और नेतृत्व क्षमता को भी महत्व मिलता है?
इन प्रश्नों के उत्तर आसान नहीं हैं। लेकिन विद्यालय सुधार के लिए इन पर बातचीत शुरू करना जरूरी है।
क्या केवल प्रशासनिक नेतृत्व पर्याप्त है?
मेरे विचार से नहीं।
एक प्रधानाध्यापक विद्यालय का प्रशासन अच्छी तरह संभाल सकता है। रिकॉर्ड समय पर पूरे हो सकते हैं। बैठकें नियमित हो सकती हैं। रिपोर्ट भी समय पर भेजी जा सकती हैं।
लेकिन फिर हमें यह पूछना होगा—
क्या इससे बच्चों का सीखना भी बेहतर हो रहा है?
यहीं प्रशासनिक नेतृत्व और शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व के बीच अंतर दिखाई देता है।
एक प्रभावी शैक्षिक नेतृत्वकर्ता यह जानना चाहेगा कि—
- शिक्षक कक्षा में क्या कर रहे हैं?
- बच्चे कैसे सीख रहे हैं?
- कौन से बच्चे पीछे रह गए हैं?
- शिक्षक को किस प्रकार के सहयोग की जरूरत है?
- आकलन से हमें क्या पता चला?
- अगले चरण की योजना क्या होनी चाहिए?
यानी नेतृत्व का केंद्र अंततः बच्चे का सीखना होना चाहिए।
हमें किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए?
यदि हम वास्तव में Educational-Academic Leadership को मजबूत करना चाहते हैं, तो पूरे शिक्षा तंत्र में एक बदलाव की आवश्यकता है।
शिक्षक को केवल प्रशिक्षण लेने वाला व्यक्ति न मानकर पेशेवर एवं संभावित शैक्षिक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखना होगा।
संकुल समन्वयक को केवल सूचना पहुँचाने वाला व्यक्ति न मानकर अकादमिक मार्गदर्शक बनाना होगा।
विकासखंड स्तर के स्रोत व्यक्तियों को केवल प्रशासनिक कार्यों में लगाने के बजाय शिक्षण-अधिगम सुधार के सहयोगी के रूप में विकसित करना होगा।
DIET को केवल प्रशिक्षण आयोजित करने वाली संस्था न मानकर जिले के शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व का केंद्र बनाना होगा।
और राज्य स्तर पर SCERT सहित संबंधित संस्थाओं को एक साझा शैक्षिक दृष्टि के साथ काम करना होगा।
एक जरूरी बात: नेतृत्व का केंद्र कौन है?
जब हम नेतृत्व की बात करते हैं तो अक्सर नेतृत्वकर्ता/संस्था प्रमुख के पद, अधिकार और जिम्मेदारियों पर चर्चा करते हैं।
लेकिन शिक्षा में एक और प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण है—
हमारे नेतृत्व का अंतिम लाभ किसे मिलना चाहिए?
उत्तर बहुत सरल है—बच्चों को।
यदि हमारा नेतृत्व शिक्षक को बेहतर सीखने में मदद करता है, शिक्षक बच्चों को बेहतर सीखने में मदद करता है और बच्चे बेहतर सीखते हैं, तभी वह नेतृत्व सार्थक है।
इसलिए शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व का अंतिम उद्देश्य पद, व्यवस्था या नियंत्रण नहीं, बल्कि बच्चों के सीखने में निरंतर सुधार होना चाहिए।
निष्कर्ष
तो आइए, हम अपने-अपने स्तर पर एक बार फिर विचार करें-
क्या हमारे विद्यालयों में केवल प्रशासन चल रहा है या वास्तव में शैक्षिक नेतृत्व भी हो रहा है?
हमारे शिक्षकों को क्या केवल निर्देश मिल रहे हैं या उन्हें लगातार अकादमिक सहयोग भी मिल रहा है?
क्या संकुल केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान का माध्यम है या वह वास्तव में शिक्षकों के पेशेवर सीखने का केंद्र बन रहा है?
और क्या हमारी पूरी व्यवस्था का ध्यान अंततः एक ही सवाल पर है—
“हमारे बच्चे बेहतर कैसे सीखें?”
मेरे विचार से यही सवाल Educational-Academic Leadership की शुरुआत है।
अगले भाग में हम थोड़ा और आगे बढ़ेंगे। वहाँ हम देखेंगे कि शिक्षकों, प्रधानाध्यापकों, संकुल समन्वयकों, विकासखंड स्रोत समन्वयकों और अन्य शैक्षिक हितधारकों में शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व विकसित करने के लिए कौन-कौन से ज्ञान और कौशल आवश्यक हैं।
क्रमशः…
आपके लिए एक विचार
अपने स्कूल या संकुल में आज ही यह प्रश्न पूछकर देखिए—
“यदि अगले एक वर्ष में हमारे बच्चों के सीखने में स्पष्ट सुधार लाना हो, तो हमारे नेतृत्व में सबसे पहले क्या बदलना चाहिए?”
शायद इस एक प्रश्न से ही सुधार की एक नई बातचीत शुरू हो जाए।
FAQs
1. शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व क्या है?
शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व वह नेतृत्व है जो विद्यालय प्रशासन के साथ-साथ बच्चों के सीखने, शिक्षण-अधिगम, आकलन, शिक्षक पेशेवर विकास और विद्यालय सुधार को दिशा देता है।
2. शैक्षिक नेतृत्व और प्रशासनिक नेतृत्व में क्या अंतर है?
प्रशासनिक नेतृत्व मुख्यतः व्यवस्था, संसाधन, नियम और कार्य-प्रबंधन पर केंद्रित होता है। शैक्षिक नेतृत्व का केंद्र बच्चों का सीखना, शिक्षक का विकास और शिक्षण की गुणवत्ता होता है।
3. संकुल समन्वयक की भूमिका केवल प्रशासनिक है?
नहीं। संकुल समन्वयक की महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षकों को अकादमिक सहयोग देना, उनके पेशेवर सीखने में सहायता करना और संकुल स्तर पर शैक्षिक सुधार को आगे बढ़ाना भी है।
4. DIET शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व में क्या भूमिका निभा सकता है?
DIET शिक्षक क्षमता-वर्धन, अकादमिक सहयोग, शोध, नवाचार और जिले की शैक्षिक आवश्यकताओं के आधार पर नेतृत्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
5. शैक्षिक नेतृत्व का अंतिम उद्देश्य क्या होना चाहिए?
शैक्षिक नेतृत्व का अंतिम उद्देश्य बच्चों के सीखने में निरंतर और सार्थक सुधार होना चाहिए। नेतृत्व की सफलता को इसी दृष्टि से देखना अधिक उपयोगी है।
यदि आप विद्यालय, संकुल, विकासखंड या जिला स्तर पर शैक्षिक नेतृत्व से जुड़े हैं, तो इस लेख को केवल पढ़कर न छोड़ें।
अपने सहयोगियों के साथ इस पर चर्चा कीजिए।
और सबसे पहले यह तय कीजिए—
“हम अपने स्तर पर बच्चों के सीखने को बेहतर बनाने के लिए नेतृत्व में कौन-सा एक बदलाव अभी से शुरू कर सकते हैं?”
आगे भाग – 2 में हम देखेंगे कि शिक्षकों, संकुल समन्वयकों, विकासखंड स्रोत समन्वयकों तथा अन्य हितधारकों को शैक्षिक-अकादमिक नेतृत्व को विकसित करने के लिए उनमें कौन-कौन से ज्ञान एवं कौशलों का विकास करना बच्चों के सीखने के लिए लाभदायक हो सकता है। क्रमशः…
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